परिचय –
प्रयागराज शहर अपनी धार्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत के लिए प्रसिद्ध है। जहां एक तरफ तीन नदियों के सुंदर संगम ने इसे विश्व प्रसिद्ध त्रिवेणी संगम बनाया। साथ ही, विभिन्न स्थानों को लेकर इसकी अलग-अलग मान्यताएं इसे और भी विशिष्ट बनाती हैं।। एक तरफ आपको आनंद भवन जो आजादी की क्रांति की याद दिलाता है तो वहीं आलोपीबाग मंदिर सती के कथा की कहानी कह जाता है। ऐसे ही आज चमत्कारिक मान्यताओं से पूर्ण, त्रिवेणी संगम के पास स्थित लेटे हुए हनुमान जी मंदिर के बारें में बात करेंगे। जानेंगे की इससे जुड़ी क्या कहानीयां एवं मान्यताएं रही हैं।
लेटे हुए हनुमान जी मंदिर प्रयागराज की प्राचीनता –
प्रयागराज में लेटे हुए हनुमान जी मंदिर त्रिवेणी संगम घाट के नजदीक ही है। इन्हे बड़े हनुमान जी मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। यह मंदिर 600-700 साल पुराना माना जाता है।
दो रूपों में एवं यहां के कोतवाल माने जाते हैं लेटे हुए हनुमान जी –
ऐसा कहा जाता है की हनुमान जी का दर्शन यहाँ दो स्वरूपों मे देखने को मिलता है। सुबह में शिव(रुद्र) रूप में दर्शन होता है जबकि दोपहर 2 बजे के बाद जब हनुमान जी का वस्त्र बदला जाता है तब उनका स्वरूप हनुमान जी के रूप में होता है।
वहीं बजरंग बली को कोतवाल भी कहा जाता है। ऐसा माना जाता है की यहां सर्वप्रथम हनुमान जी है उसके बाद सभी देवता है। यह सभी की रक्षा करते हैं।

बड़े हनुमान मंदिर प्रयागराज की प्रतिमा के बारें में –
बात की जाय बड़े हनुमान जी मंदिर के प्रतिमा की तो यह 20 फिट लंबी है। हनुमान जी की यह प्रतिमा दक्षिणामूखी है अर्थात इनका मुख दक्षिण की ओर है। हनुमान जी के दांए हाथ की तरफ राम-लक्ष्मण तथा बाएं हाथ में गदा है। साथ ही बाएं पैर में कामदा देवी एवं दाएं पैर से दबा अहीरावण है। किले वाले हनुमान जी की मूर्ति 6-7 फिट नीचे विराजमान है। विश्व की यह एक मात्र हनुमान जी की लेटी हुई प्रतिमा है।
लेटे हुए हनुमान जी के बारे में प्रसिद्ध कहानीयां एवं मान्यताएं –
पुराणों की बातें जो जनश्रुतियों में प्रसिद्ध है –
कहते हैं की जब भगवान सूर्य से अन्जनी पुत्र शिक्षा प्राप्त कर चुके तो उन्होंने गुरु दक्षिणा देने की बात कहीं। जिस पर भगवान सूर्य देव ने पहले तो मना किया, परंतु बार-बार अनुरोध करने पर उन्होंने हनुमान जी से कहा मेरे वंश में भगवान विष्णु अवतार लिए हैं। जो वनवास के लिए पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ निकले हैं। तुम उनकी रक्षा करना।
गुरु से आज्ञा पाकर हनुमान जी प्रयाग पहुंचे। जहां पर वे बड़ी आतुरता से श्रीराम का इंतजार करने लगे।
परंतु भगवान को लगा अगर बजरंगबली ही सारे राक्षसों का नाश कर देंगे तो उनका अवतार व्यर्थ हो जाएगा। इसके उपाय में उन्होंने माया को बुलाया और हनुमान जी को रोकने का आदेश दिया।
संगम तट पर शाम को पहुचने के कारण हनुमान जी ने सोचा यहीं आराम करते हैं। वहीं पर वो ध्यान लगाकर बैठ गए और उसके कुछ देर बाद वो ऋषि भारद्वाज आश्रम में चले गए। जिससे माया को अभी तक मौका नहीं मिल पाया था। हनुमान जी को आश्रम से पता चला की भगवान श्रीराम कल प्रयाग से होकर आने वाले हैं जिससे वो प्रयाग में आकर विश्राम करने का विचार करते हैं। इसके बाद माया ने इन्हे गहरी नींद में सुला दिया।
भगवान राम जब यहां से गुजरे तो वरदान दिया की जो कोई भी हनुमान जी की लेटे हुए प्रतिमा के दर्शन करेगा बिना किए उसे भगवान प्राप्त हो जाएंगे। साथ ही जो भी कष्ट विपदा होगी उसका हरण होगा।

लंका विजय के पश्चात की कथा(पुनर्जन्म की कथा ) –
ऐसा कहा जाता है की बजरंगी जब लंका विजय के बाद वापसी कर रहे थे तो बहुत कष्ट में थे। और उनकी स्थिति इतनी विकट हो गई थी की वो मृत्यु के नजदीक पहुँच गए थे। तब माता सीता नें उन्हे सिंदूर देते हुए चीरायु होने का वर दिया था। साथ ही उन्होंने त्रिवेणी संगम में स्नान के बाद जो भी उनके दर्शन करेगा उसकी समस्त मनोकामना पूर्ण होगी। तब से सिंदूर अर्पित किया जाना बहुत ही शुभ माना जाता है।
वहीं एक किंवदंती यह भी है की माता सीता ने थके एवं घायल हनुमान जी को लेप किया था।
कन्नौज की कहानी –
एक वैद्य को उसके पुरोहित संतान उत्पत्ति का उपाय बताया थी की विंध्याचल पर्वत के पत्थर से बनी हनुमान जी की विशाल मूर्ति को समस्त तीर्थ में स्नान करवाने को कहा। मूर्ति लेकर आते वक्त प्रयाग में शाम हो गई और उन्हे वहाँ स्वप्न में हनुमान जी ने कहा की मूर्ति यहीं छोड़ दो सारी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाएगी। परंतु उसे विश्वास नहीं हुआ, अगले दिन मूर्ति ले जाते वक्त जल में शमा गई। बाद में उसे संतान की प्राप्ति हुई थी।
इस कहानी कों लोग दूसरे रूप में भी कहते हैं। कहानी है की कन्नौज के राजा के कोई संतान नही था। उनके गुरु ने कहा की हनुमान जी की एक ऐसी प्रतिमा बनवाकर लाओ जो राम-लक्ष्मण को नागपाश से मुक्त कराने के लिए पाताल में गए थे। साथ ही यह प्रतिमा विंध्याचल पर्वत से बनवाकर लायी जाना चाहिए। जिसे नदी में नाव के द्वारा लाते वक्त जल बढ़ने से मूर्ति डूब गई। जो बाद में बाबा बालगिरी महाराज को प्रतिमा प्राप्त हुई। जिसके बाद यहां राजा ने मंदिर का निर्माण कराया।
मुग़लकाल में मंदिर विस्थापान की नाकाम कोशिश –
अकबर से जुड़ी कहानी
मुगलों के काल में जब अकबर अपने सैन्य कुटनीतियों की दृष्टि से इलाहाबाद किला का निर्माण कर रहा था तो उसने मंदिर को दूसरी जगह विस्थापित करने को सोचा। परंतु अपनी की गई भरसक कोशिशों के बाद वह ऐसा ना कर सका जिससे बाद में उसे किले की दीवाल कों घूमावदार बनाना पड़ा।
वहीं अकबर के बारें में दूसरी बात यह कही जाती है की जब वह किले का निर्माण करा रहा था तो गंगा-यमुना के जल के बहाव में दीवाल ढह जाती थी। जिससे बाद में वहाँ के पुरोंहितो के कहने पर उसने पहले बाहरी दीवाल बनावाई उसके बाद किले का निर्माण हुआ। बाढ़ के पानी से बचाव के लिए उसने बांध का भी निर्माण करवाया था।
औरंगजेब द्वारा भी किया गया प्रयास
इसके बाद अकबर का वंशज औरंगजेब ने भी अपने लगभग 100 सिपाहियों को मूर्ति हटाने के लिए लगाया। लेकिन मूर्ति टस से मस ना हुई। मूर्ति ऊपर आने के बजाय और नीचे चली जा रही थी। इसके अलावा उसने उपकरण का भी इस्तेमाल किया लेकिन हारकर उसे अपना आदेश वापस लेना पड़ा।
हर साल लेटे हुए हनुमान जी मंदिर प्रयागराज में पहुँचता है माँ गंगा का जल –
एक मान्यता यह है की प्रत्येक साल त्रिवेणी मां हनुमान जी को स्नान कराती है। जिसके बाद हनुमान जी शयन अवस्था में चले जाते हैं। इस साल 2025 में भी अब तक हनुमान जी स्नान कर चुके है। और वो फिलहाल शयन मुद्रा में है। जब तक नीर शयन की अवस्था में होते हैं तब तक उनके प्रारूप को पूजा जाता है।

बड़े हनुमान मंदिर प्रयागराज के आधुनिक समय में महत्व –
बड़े हनुमान मंदिर प्रयागराज आज भी करोड़ों लोगों की श्रद्धा का केंद्र बना हुआ है। आज भी यहां पर हजारों की संख्या में लोग प्रति मंगलवार और शनिवार को दर्शन करने आते हैं। साथ ही अपनी मान्यता की पूर्ति के लिए निशान मानते है जिसके पूर्ण होने पर लोग झंडा चढाते हैं। जिसमें हरे बांस में लाल कपड़े का झंडा लगाया जाता है। इसके अलावा हर साल त्रिवेणी संगम पर माघ मेला लगता है। इसके अलावा हर छह महीने एवं 12वें वर्ष में अर्धकुम्भ एवं महाकुम्भ का आयोजन होता है।
किले वाले हनुमान मंदिर के परिसर में बन चुका है नया कोरीडोर –
अभी यहां पर नया-नया कुम्भ के समय मंदिर के चारों ओर कोरिडोर बना दिया गया है। जिससे मंदिर के परिसर बढ़ गया हैं और लोग कतार में लगकर मंदिर में प्रवेश करते हैं। साथ ही मंदिर के परिसर में प्रवेश के लिए दो गेट के साथ 10 छोटे-छोटे द्वार का निर्माण किया गया है। जिसका निर्माण पीडीए के द्वारा कराया गया है जिसकी लागत 40 करोड़ है। जिस स्थान पर बनाया गया है उसके बदले सेना को कहीं जमीन दी जाएगी।

समापन –
लेटे हुए हनुमान जी मंदिर प्रयागराज एकमात्र ऐसी मंदिर है जहां हनुमान जी आराम की मुद्रा में है। इस युग में नाम मात्र से ही सारे कष्ट दूर हो जाते हैं। हनुमान जी अपने भक्तों को अभयदान देते हैं।
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