प्रस्तावना
आज हम अपना 79वां स्वतंत्रता दिवस मना रहे हैं। जगह-जगह पर विभिन्न कार्यक्रम और जश्न मनाएं जा रहे। लेकिन 15 अगस्त यह ना केवल भारत का स्वतंत्रता दिवस बल्कि प्रयागराज शहर के लिए संघर्ष और परिवर्तन की एक कहानी रहा है। संगम नगरी ने जहां 1765 की इलाहाबाद संधि नें पराधीनता की नींव रखी तो वहीं 1947 में उसी तारीख़ को आज़ादी का जश्न भी मनाया। यह विरोधाभास ही इसे इतिहास का एक विशिष्ट स्थान बनाता है। आज हम 15 अगस्त प्रयागराज के आस-पास हुए घटनाक्रम से रूबरू होंगे।
1765 – इलाहाबाद संधि: गुलामी की शुरुआत
वैसे यह घटना 15 अगस्त को ना होकर उसके आगे दिन हुई थी। 15 अगस्त के अगले दिन यानि 16 अगस्त 1765, इलाहाबाद किले में यह संधि हुई थी। जिसमें ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी, मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय और अवध के नवाब शुजा-उद-दौला के हस्ताक्षर हुए।
इस संधि के अनुसार बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी (राजस्व वसूली का अधिकार) अंग्रेजों को देनी पड़ी। संधि पर हस्ताक्षर करना ये वही पल था जिसने भारत में ब्रिटिश राज की औपचारिक नींव रखी।

1942 – ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन में प्रयागराज की आवाज़
अगस्त 1942 में महात्मा गांधी के भारत छोड़ो आंदोलन के आह्वान पर प्रयागराज के युवा सड़कों पर उतर आए। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्रों ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ प्रदर्शन किए। चंद्रशेखर पार्क से विरोध प्रदर्शन में रैलियाँ निकाली गयीं। कई क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर उन्हे जेल में डाल दिया गया। अगस्त का महीना प्रयागराज को हमेशा विद्रोह और बलिदान की यादों में समेटे हुए है।
15 अगस्त प्रयागराज में 1947 स्वतंत्रता की सुबह
15 अगस्त आजादी की खुशियों के साथ दस्तक दी सारा देश जहां आजादी की महकती साँसे ले रहा था। वहीं 15 अगस्त 1947 को प्रयागराज का हर कोना भी देशभक्ति में सराबोर था। आनंद भवन और स्वराज भवन तिरंगे एवं झालरों से सजा दिया गया था। चौक, कटरा और सिविल लाइंस में देशभक्ति के गीत बजाए जा रहे थे।
मिठाईयां खरीदी जा रही थी और हाथ में झंडे लेकर आजादी के एहसास को महसूस किया जा सकता था। यह दिन सिर्फ आज़ादी का उत्सव नहीं था, बल्कि लंबे समय तक चलने वाले संघर्ष का परिणाम था।

नैनी ब्रिज(पुराना यमुना पुल) – विकास का प्रतीक
15 अगस्त 1865 को पुराना यमुना पुल रेल और सड़क दोनों यातायात के लिए खोल दिया गया था। जिसने व्यापार और यातायात को एक नई दिशा दी। नैनी ब्रिज प्रयागराज को औद्योगिक क्षेत्र नैनी और पूर्वी भारत से जोड़ता है।
आज भी यह शहर की पहचान का एक खास हिस्सा है।

15 अगस्त प्रयागराज के इतिहास का संगम
प्रयागराज कों तीर्थों का राजा कहा जाता है और त्रिवेणी संगम इसका अहम हिस्सा है। उसी प्रकार अगर हम महीने के हिसाब से देखें तो पराधीनता और स्वतंत्रता का अद्भुत संगम देखने कों मिलता है। 16 अगस्त 1765 इलाहाबाद संधि नें गुलामी की बेड़ियों में जकड़ा तो 15 अगस्त 1947 नें भारत कों आजाद कर दिया। यानी एक ही धरती ने पराधीनता और स्वतंत्रता, दोनों को एहसास किया।
समापन
15 अगस्त प्रयागराज के लिए सिर्फ एक दिन नहीं, बल्कि इतिहास का एक आईना है जिसमें संघर्ष, बलिदान और विजय एक साथ दिखते हैं। संगम नगरी हमें स्मरण कराती है कि आज़ादी की कीमत पीढ़ियों के सपनों, त्याग और साहस ने चुकाई है।
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