सुजावन देव मंदिर(पद्म महादेव मंदिर) प्रयागराज – भूमिका
प्रयागराज जो की वेदों-पुराणों में भी अपनी धार्मिक एवं सांस्कृतिक वैभव की ऐतिहासिकता सिद्ध करता है। आज ऐसे ही एक चमत्कारिक एवं पूर्णतः प्राकृतिक कृति की बात करने चल रहे है। हाँ जिसको देखने के बाद आप बिना चकित हुए नहीं रह सकते हैं। मै बात कर रहा हूँ यमुना नदी के बीचोंबीच स्थित शिवधाम – सुजावन देव मंदिर प्रयागराज की। सुजावन देव मंदिर के इतिहास के साथ आज मान्यताओं की भी बात करेंगे।
सुजावन देव मंदिर प्रयागराज की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि –
वैसे इस मंदिर की स्थापना के बारे में कोई ठोस सबूत नहीं मिले। ऐसा माना जाता है की यह मंदिर सैकड़ों सालों से अपने अस्तित्व में हैं। एक मान्यता के अनुसार भगवान राम, सीता और लक्ष्मण जब वन को जा रहे थे, यह मंदिर की स्थापना तब श्रीराम ने की थी। इस मंदिर की कुछ दूरी पर ‘सीता रसोई’ नामक स्थान पहाड़ी पर प्रसिद्ध है। जिसका खनन करने पर इसका समय आज से 7000 वर्ष पूर्व का माना गया है।
सुजावन के बारें में जानकारी एवं वर्तमान स्वरूप में आने वजह
वहीं वर्तमान में बात करे तो जब पुराने यमुना पुल का निर्माण किया जा रहा था। जिसके निर्माण के लिए बेहतर पत्थर की जरूरत थी जो यमुना के तेज बहाव को सहन कर पाए। उसी की खोज में इस मंदिर के बारें में पता चला।
वहीं जब अकबर इलाहाबाद का किले का निर्माण करवा रहा था तब पत्थर यहीं से यमुना के रास्ते से लेकर जाया गया था। संगम क्षेत्र तक पत्थर ले जाना बहुत सुविधाजनक था क्योंकि यमुना नदी का बहाव इसी दिशा में था। जबकि इसके अलावा अकबर के पास मिर्जापुर से पत्थर लाना पड़ता जो की परिवहन की दृष्टि से कठिन था। इससे पहले ऐसा माना जाता है की यह मंदिर भूमि क्षेत्र से जुड़ी हुई थी।
मंदिर पर आक्रमण और पुनर्निर्माण(sujavan dev temple history)
मुगलों नें भारत में बहुत सारी मंदिरों कों नष्ट किया है। उसी कड़ी में ऐसा माना जाता है की औरंगजेब का मामा शाइस्ता खान ने 1645 ई. में आक्रमण किया था। वह इस मंदिर कों ध्वस्त करके यहां 21 फुट व्यास का जुआघर
बनवा दिया था। लेकिन बाद में स्थानीय लोगों के द्वारा पुनः इस पर अधिकार कर शिवलिंग की स्थापना की गई।
यहां पर भोंलेनाथ की पंचमुखी शिवलिंग स्थित है साथ ही यहां पर श्रीराम की टूटी हुई प्रतिमा है। यहां पर पांडवों की प्रतिमा उकेरी हुई है।
हैंगिंग शिव मंदिर(hanging shiv temple prayagraj) रहस्यमयी स्थिति और प्राकृतिक सौंदर्य
बात करें मंदिर की स्थिति की तो बहुत ही रोचक रूप से जल के बीच में स्थित है। पानी के बीच में चट्टानों के ऊपर चट्टान की एक श्रंखला के ऊपर मंदिर स्थित है। इस मंदिर के एक ओर अब पक्का चबूतरा बना दिया जिससे होकर सीढ़ियों के माध्यम से आप मंदिर पर जा सकते हैं।
यह मंदिर 60 फुट ऊंचाई पर स्थित है। बरसात के समय में यह मंदिर हवा में लटकी हुई दिखाई देती है जिससे इसे हैंगिंग शिव मंदिर(hanging shiv temple prayagraj
) भी कह सकते हैं।

धार्मिक महत्त्व और मेले
इस मंदिर के पास कार्तिक महीने में यम द्वितीया का मेला आयोजित होता है। दीपावली के बाद यहां दो दिन लगातार मेला रहता है जहां हजारों लोग मेले में आते हैं। जिसमें कई जिलों के साथ मध्य प्रदेश से भी लोग भाग लेते हैं। इसके बारें में एक कहानी प्रसिद्ध है जो यमुना और उनके भाई यमराज से जुड़ी हुई है।
यमराज को उनकी बहन यमुना बहुत स्नेह करती थी। वो अक्सर अपने भाई को बुलाती रहती थी पर वो नहीं आया करते थे। परंतु एक बार बहन यमुना ने कार्तिक शुक्ल पक्ष में आने का वादा ले लिया।
इतना स्नेह से बुलाने पर यमराज यमुना के यहां गए। बहन यमुना के सेवा-सत्कार से यमराज उनसे वरदान मांगने को कहा। तब यमुना जी ने कहा इसी समय जो भाई-बहन साथ में स्नान करके पूजा-अर्चना करेंगे उनको आपस भय खत्म हो जाए एवं उन्हे अकाल मृत्यु से मुक्ति मिले। यमराज ने उन्हे तथास्तु कहा। तब से हर साल मेल लगता है और लोग स्नान के साथ पूजा करते हैं।
सांस्कृतिक और फिल्मी जुड़ाव
सांस्कृतिक रूप से भी यहां जुड़ाव कम नहीं है। इसके प्राकृतिक दृश्यों की सुंदरता से मोहित होकर यहां फिल्मों और गीतों की शूटिंग होती रहती है। यहां पर ओमकारा फिल्म रक्तांचल सीरीज और भोजपुरी फिल्म आशिकी के कुछ हिस्सों की शूटिंग हुई थी।
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संरक्षण की ज़रूरत और खनन खतरे
यह मंदिर मैप पर भी आपको मिल जाएगा। सुजावन देव मंदिर पूरातत्व विभाग के द्वारा संरक्षित है। फिर भी यहां के रख-रखाव का ख्याल सही तरीके से नहीं रखा जाता। जिसका परिणाम ये है की खनन माफीयों के द्वारा खनन करने से मंदिर के नींव वाले पत्थर कमजोर हो रहे हैं। और मंदिर का अस्तित्व खतरे में पड़ता जा रहा है। बरसात के अलावा मंदिर के अगल-बगल पानी काम हो जाता है।
सुजावन देव मंदिर प्रयागराज कैसे पहुँचें?
प्रयागराज शहर से यहां की दूरी 20 किमी के आस-पास पड़ेगी। इसके अलावा आपको यहां आने के लिए दो रास्ते हैं एक है जो आप सीधे घूरपुर से तो दूसरा जसरा से होकर आ सकते है। आपको सबसे प्रसिद्ध रास्ता घूरपुर से होकर मंदिर आना है। घूरपुर से 3 किमी पश्चिम की ओर देवरिया गाँव में यह मंदिर पड़ती है। यह मंदिर भीटा के नजदीक है तो लोग इसे भीटा सुजावन देव मंदिर के नाम से भी जानते हैं।
निष्कर्ष
सुजावन देव मंदिर प्रयागराज ना केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि इतिहास, पौराणिकता, रहस्य और प्राकृतिक सौंदर्य से पूर्णता का जीवंत प्रतीक है। इसकी मनमोहक स्थिति, रामायण से जुड़ी मान्यताएँ सभी मिलकर इसे प्रयागराज का एक अनमोल और संरक्षण योग्य धरोहर बनाते हैं।

