जैसा की प्रयागराज अपने धार्मिक एवं ऐतिहासिक संस्कृति एवं विरासत के लिए प्रसिद्ध है। यहां के पवित्र स्थलों में एक अनोखा मंदिर स्थित है – पातालपुरी मंदिर प्रयागराज। यह पवित्र स्थल धरती के गर्भ में बसा है, जहाँ प्राचीन समय से संत, तीर्थयात्री और तपस्वी अपनी आस्था अर्पित करते आए हैं।


पातालपुरी मंदिर पौराणिक कथाएँ
मोक्ष और पुनर्जन्म से जोड़ा जाता है
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पातालपुरी मंदिर मोक्ष और पुनर्जन्म से संबन्धित माना जाता है। सत्य युग में भगवान विष्णु ने यहाँ तपस्या की थी, इसलिए इसे मोक्ष का महत्वपूर्ण योग स्थान माना जाता है।
अमर वृक्ष की कथा
मंदिर के भीतर स्थित अमर वट वृक्ष, जिसे अक्षयवट भी कहते हैं, कहा जाता है कि यह युगों से है।
किंवदंती है कि अक्षयवट अस्तित्व में रहेगा जब सृष्टि जलमग्न हो जाएगी, इसलिए इसे “अक्षय” कहा जाता है।
ऋषियों और देवताओं का ठिकाना
पुराणों के अनुसार प्राचीन समय से ही यह कई तपस्वी की तप भूमि रही है। एक मान्यता यह है की श्रीराम, जानकी और लक्ष्मण जब वनवास जा रहे थे यहां रुक के पूजा की थी।
माँ सीता ने अपने कंगन दान किए थे
त्रेता युग में माता सीता ने मंदिर परिसर में अपने कंगन दान किए थे। धार्मिक रूप से, यह स्थान गुप्त दान देने की परंपरा के लिए भी जाना जाता है। यहां श्रद्धालु तपस्या और भक्ति के लिए आते हैं. वे मानते हैं कि यहां की पूजा जीवन को शान्ति और मोक्ष प्रदान करती है।


पातालपुरी मंदिर का ऐतिहासिक महत्व
इस मंदिर का इतिहास काफी पुराना है। ऐसा माना जाता है की इस मंदिर का अस्तित्व वैदिक काल से ही है और इसे अखंड भारत की प्राचीन मंदिरों में गिना जाता है। इस मंदिर का जमीन के नीचे होने के कारण ‘पातालपुरी मंदिर’ कहा जाता है। भगवान राम के अलावा चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी यहां की यात्रा की थी।
ऐसा कहा जाता है की वर्तमान मंदिर का स्वरूप अकबर के किले बनवाने की वजह से है। मंदिर में लगभग 44 देवी-देवताओं की मूर्तियां है। जिसमें भगवान शिव, विष्णु, अर्धनारीश्वर और तीर्थराज प्रयाग की प्रतिमाएं शामिल हैं। मंदिर में भगवान शनि की एक अखंड ज्योति भी साल भर प्रज्वलित होती रहती है।
वास्तुकला और संरचना
मंदिर की सबसे बड़ी खासियत इसकी भूमिगत होना है। सीढ़ियों के द्वारा इस मंदिर के अंदर प्रवेश होता है। मंदिर के अंदर एक गलियारा है इसे धार्मिक दृष्टि से ‘पृथ्वीलोक’ माना जाता है। यहाँ पर मानव कर्म को निवास स्थान बताया गया है। मंदिर के प्रवेश द्वार पर धर्मराज की मूर्ति एवं बाहर निकलते समय यमराज की मूर्ति है। इस तरह, मंदिर की वास्तुकला और डिज़ाइन दोनों परमेश्वर और जीवित लोगों की दृष्टि को धार्मिक अनुभव में परिणत करती है।


पातालपुरी मंदिर में दर्शन
यह मंदिर त्रिवेणी संगम के पास किले में स्थित है। वैसे तो यह मंदिर सुबह से शाम तक खुलता है लेकिन कुछ हिस्सा सेना के अधीन होने से सीमित समय के लिए खुलता है। यहां दर्शन से पहले जानकारी ले लेनी चाहिए क्योंकि कभी-कभी खास मौके पर ही खुलता है – जैसे कुम्भ मेला में।
यहाँ पास में ही त्रिवेणी संगम के अलावा लेटे हुए हनुमान मंदिर भी स्थित है।
निष्कर्ष
यहां सीढ़ियां उतरते हुए आप एक आध्यात्मिक यात्रा का अनुभव करेंगे जो आपके जीवन के रहस्यों और आपके कर्मों से सीधे जुड़ा हुआ है। मंदिर की प्राचीन मूर्तियों को देखकर पौराणिक कथाएं जीवंत लगती हैं। यह मंदिर आम मंदिरों से अलग है क्योंकि इसकी धरोहर धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व से भरपूर है। यदि आप प्रयागराज आएं तो पातालपुरी मंदिर अवश्य देखें।

