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शुक्रवार, दिसम्बर 5, 2025

अक्षयवट वृक्ष प्रयागराज – पवित्र अमर वृक्ष की पौराणिक कथा और इतिहास

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भूमिका

अक्षयवट वृक्ष प्रयागराज के किले के भीतर, पत्थरों की दीवारों और सैनिक इतिहास के बीच खड़ा है। यह केवल एक पेड़ नहीं है; यह मोक्ष, आस्था और सनातन चक्र का जीवंत प्रतीक है। ऐसा माना जाता है की यहाँ खड़े होकर आत्मा खुद को ब्रह्म में विलीन होता हुआ महसूस करती है।

अक्षयवट का अर्थ 

संस्कृत में, “अक्षय” का अर्थ है जो क्षय या नाश नहीं होता।

“वट” का अर्थ है पीपल का वृक्ष या बट वृक्ष।

वह वृक्ष है जो समय, मृत्यु और विनाश से परे है, वह अक्षयवट है। यह ब्रह्मज्ञान और मोक्ष का प्रतीक है।

 अक्षयवट वृक्ष प्रयागराज पुराणों और धर्मग्रंथों में वर्णन

  • स्कंद पुराण में कहा गया है कि “जो अक्षयवट के दर्शन करता है, वह तीर्थों का पुण्य प्राप्त करता है।” स्कंद पुराण, सनातन धर्म के तीर्थों और स्थानों के विवरण में सबसे समृद्ध ग्रंथ माना जाता है, उसमें स्पष्ट रूप से लिखा है – “तीर्थराजे प्रयागे च अक्षयवटो महान् स्थितः।

                               तस्य दर्शनमात्रेण सर्वतीर्थफलं लभेत्॥”

अर्थ – (तीर्थराज प्रयाग में जो अक्षयवट स्थित है, उसका मात्र दर्शन करने से सभी तीर्थों का फल मिल जाता है।)

  • महाभारत में युधिष्ठिर ने यहाँ पिंडदान कर पितृ आत्मा को प्रसन्न किया था।
  •  पद्म पुराण के अनुसार, ब्रह्मा ने यहाँ सृष्टि रचना से पहले तप किया था। पद्म पुराण में कहा गया है कि जब भगवान ब्रह्मा ने सृष्टि बनाने का विचार किया, तो उन्होंने पहले एक सुविधाजनक स्थान की तलाश की, जहां वे बैठकर ध्यान दे सकें।

             तब उन्होंने सरस्वती, यमुना और गंगा के संगमस्थल को चुना। उसी स्थान पर एक वटवृक्ष के नीचे तप किया, जिसे “अक्षयवट” कहते हैं।

जब तक ब्रह्मांड रहेगा, यह वृक्ष अमर रहेगा। जिसने इसकी छाया पर ध्यान दिया, उसे ब्रह्मलोक मिलेगा।  ब्रह्मा ने खुद घोषणा की थी।

भगवान राम और मार्कण्डेय ऋषि की अक्षयवट वृक्ष कथा

मार्कण्डेय ऋषि की कथा:

मार्कण्डेय ऋषि को अमरता का वरदान प्राप्त था। उन्होंने वर्षों तक प्रयागराज के संगम क्षेत्र में अक्षयवट वृक्ष के नीचे बैठकर तपस्या की।

एक दिन उन्होंने भगवान विष्णु से पूछा – “प्रभु! क्या मैं स्वयं प्रलय के समय की स्थिति देख सकता हूँ?”
भगवान मुस्कराए और बोले – “हाँ, देखो…”

तब मार्कण्डेय ऋषि ने देखा –
चारों ओर जल ही जल फैला था, प्रलय का भयानक दृश्य। सब कुछ डूब चुका था। लेकिन एक स्थान बचा था अक्षयवट की छाया में एक शिशु भगवान विष्णु की गोद में सो रहा था। यह शिशु विष्णु की प्रलयावस्था की लीला थी।
यही वह दृश्य था, जहाँ से यह धारणा बनी कि “प्रलय हो जाए, पर यह वटवृक्ष नष्ट नहीं होगा।”

भगवान राम की कथा:

वनवास के समय भगवान राम प्रयागराज आए और भारद्वाज ऋषि से भेंट की। ऋषि ने उन्हें अक्षयवट का महत्व बताया।
राम ने लक्ष्मण और सीता के साथ संगम स्नान करने के बाद अक्षयवट को प्रणाम किया। ये वो पल था जब उन्होंने अपनी जीवन यात्रा में पहली बार “विरक्ति” और “त्याग” के उच्चतम बोध को महसूस किया।

akshayavat tree in prayagraj, Akshay Vat story

 मुगल काल से अंग्रेजों तक – क्यों छिपाया गया अक्षयवट वृक्ष प्रयागराज?

अकबर ने प्रयागराज में जब किला बनवाया। तो उसे हिंदुओं की इस आस्था से खतरा महसूस हुआ। हिंदुओं में एक मान्यता थी की जो इस वृक्ष से कूप में कुदने पर मोक्ष की प्राप्ति होती थी। उसने आदेश दिया कि अक्षयवट को किले की दीवारों के भीतर कर दिया जाए और आम जनता का प्रवेश रोक दिया जाए। 

200 साल तक यह वृक्ष सिर्फ सैन्य क्षेत्र में था। यहां तक कि अंग्रेजों ने इसे “बंद क्षेत्र” कहा।

 2019 कुंभ और पुनरुद्धार – जब जनता को फिर से मिला अक्षयवट दर्शन

प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 2019 में पहली बार जनता के लिए अक्षयवट खोला।

अब श्रद्धालु मंदिर के भीतर जाकर उस वृक्ष को देख सकते हैं जो मोक्ष, धर्म और इतिहास की जीवित धरोहर है।

अक्षयवट वृक्ष प्रयागराज क्यों कहलाता है अमर?

  • पुराणों के अनुसार यह वृक्ष प्रलय के समय भी अक्षुण्ण रहता है। 
  • भूत (अतीत), वर्तमान, और भविष्य यह तीन कालों का साक्षी है।
  • इसके नीचे तीन प्रमुख देवताओं ब्रह्मा, विष्णु, शिव ने तप या लीला की है।
  • यह पिंडदान और आत्मशांति का शाश्वत स्थल माना गया है।  

 निष्कर्ष 

अक्षयवट वृक्ष प्रयागराज में केवल एक वृक्ष नहीं है; वह हजारों वर्षों से एक मौन साधु की तरह खड़ा है। यह वृक्ष युगों का अंत, संतों की साधना, सम्राटों का पतन और आस्थावानों का उत्थान का साक्षी रहा है। कुछ संतों का मानना है कि यह वटवृक्ष, विष्णु का ही रूप है। इसकी छाया में बैठने से मनोबल और ध्यान की शक्ति बढ़ती है।

यह पेड़ बताता है कि साधना, सत्य और श्रद्धा से जुड़ा हुआ व्यक्ति कभी नहीं मरता। इसी को “अक्षय” कहा जाता है।

अक्षयवट वृक्ष के पास स्थित है लेटे हुए हनुमान जी की मंदिर

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