परिचय –
आज इस लेख के द्वारा प्रयागराज की वर्षों से चली आ रही पुरानी परंपरा के बारे में बात करेंगे। जी आप लोगों को प्रयागराज में होने वाली घोड़ा गाड़ी रेस के बारें में अवगत कराएंगे। प्रयागराज में सावन का महीना धार्मिक उत्सवों के साथ-साथ लोक परंपरा का भी महीना है। उन्हीं में से एक है प्रयागराज की गहरेबाजी, जिसे कदंबबाज़ी, टांगा रेस या इक्का रेस भी कहते हैं। इस परंपरा में खेल, धार्मिक श्रद्धा और समाज की तहज़ीब भी शामिल हैं।
क्या है प्रयागराज की गहरेबाजी?
गहरेबाजी, एक प्रकार की घोड़ा गाड़ी दौड़ है जिसमें ट्रेंड(प्रशिक्षित) घोड़े धीमी लेकिन ठहरावभरी चाल में दौड़ते हैं। यह कोई रेसकोर्स वाली सरपट दौड़ नहीं है; इसके बजाय, यह एक सधा हुआ “कम” (pace) है, जो सवार और घोड़े की ट्रेनिंग की कला को दिखाता है।
प्रयागराज की गहरेबाजी का इतिहास: राजा हर्षवर्धन से लेकर पांडा समाज तक
वैसे इसके बारें में कोई एक मत जानकारी नहीं है कुछ लोग इसे 200 साल पुरानी परंपरा तो कुछ और पुरानी मानते हैं। फिर भी ऐसा माना जाता है की गहरेबाज़ी की जड़ें लगभग हजारों वर्ष पुरानी हैं। महाराज हर्षवर्धन के समय में भी ऐसी दौड़ होती थी। प्रयागराज के तीर्थ पुरोहितों, खासकर भारद्वाज गोत्र के पंडों ने इसे बचाया। धीरे-धीरे इसमें मुस्लिम, यादव, चौरसिया, पंजाबी आदि विभिन्न समुदायों की भागीदारी बढ़ती गई।
सावन और गहरेबाजी का पवित्र रिश्ता(horse race in Allahabad)
सावन का महीना भगवान शिव की उपासना के लिए जाना जाता है। लेकिन इस समय, विशेष रूप से हर सोमवार को, प्रयागराज में गहरेबाज़ी होती है, जो लोगों को आस्था और मनोरंजन देती है। ऐसा कहा जाता है यह आयोजन उतना ही पुराना और श्रेष्ठ है जितना कि संगम पर स्नान करना।

कैसी होती है प्रयागराज की गहरेबाजी की दौड़?
इक्के (टांगा) को शीशम की लकड़ी से बग्घी को सजाया जाता है। इस दौड़ में घोड़ों की चाल होती है — सिंधी, माधुरी, दुलकी, चौटाला। रेस में एक-एक करके घोंड़े दौड़ते हैं, न कि सभी घोड़े एक साथ सरपट छोड़ दिए जाते हैं। यह एक “शो मैच” की तरह होता है, जिसमें दर्शक घोड़े की चाल और लय को समझने की कोशिश करते हैं।
कहां होती है गहरेबाजी(इक्का रेस)?
यह दौड़ पहले विश्वनाथगंज से मिंटो पार्क तक होती थी, लेकिन उसके बाद मेडिकल कॉलेज चौराहा से पुराने यमुना पुल तक के मार्ग पर होती है। इस दौरान ट्रैफिक भी बदलाव होता था। वर्तमान में यह रेस नए यमुना पुल(नैनी नया पुल) के नीचे होती है।
प्रयागराज की परंपरा में कौन भाग लेते हैं?
यहां किसी समुदाय के लिए रोक नहीं है। विभिन्न मान्यता रखने वाले लोग साल भर अपने घोड़ों को गहरेबाज़ी के लिए ट्रेन करते हैं, और इस रेस में भाग लेते हैं। सिंधी नस्ल के घोड़े सबसे ज्यादा सफल माने जाते हैं क्योंकि उनमें “कम” यानी ठहराव वाली चाल का जन्मजात गुण पाया जाता है। इसके अलावा काठियावाड़ी, पंजाबी, मारवाड़ी, अंग्रेजी नस्लों के घोड़ों को भी विशेष ट्रेनिंग के द्वारा तैयार किया जाता है।
सोशल मीडिया, लोक-उत्सव और संस्कृति का असली संगम
आज के डिजिटल युग में प्रयागराज की गहरेबाजी के वीडियो क्लिप्स और रील्स YouTube और Instagram पर वायरल होते हैं। अब यह परंपरा स्थानीय मेले से देश भर में चर्चा का विषय बन गई है।
गहरेबाजी सिर्फ एक दौड़ नहीं है; यह गंगा-जमुनी तहज़ीब का प्रतीक है। हिन्दू-मुस्लिम सभी समाज इसमें भाग लेते हैं। यह परंपरा पुरानी कहानी कहती है कि प्रयागराज की आत्मा मंदिरों में नहीं, बल्कि सड़क पर चलते इक्कों में भी बसी है।
निष्कर्ष
प्रयागराज की गहरेबाजी कोई मनोरंजन बस नहीं है बल्कि यह परंपरा, संस्कृति और समर्पण की जीवंत तस्वीर है। यह एक ऐसी विरासत है जिसे न सिर्फ बचाने की जरूरत है, बल्कि इसके महत्व को पूरी दुनिया को समझाने की भी जरूरत है। क्या आपने देखी है गहरेबाज़ी की दौड़; अगर नहीं तो सावन चल रहा है जाइए एक बार इसका अनुभव कीजिए।
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