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बुधवार, फ़रवरी 18, 2026

Khusro Bagh Prayagraj: चार मकबरे, एक बाग़ और कई अधूरी मुग़ल गाथाएँ

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भूमिका -ख़ुसरो बाग प्रयागराज – मुग़ल इतिहास की छांव में एक ख़ामोश बाग

प्रयागराज एक ऐसा शहर जो अपने भीतर धार्मिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत समाहित किए हुए है। इसका कण-कण त्याग, समर्पण और नई चेतना की कहानी कहता है। प्रयागराज भी मुगलों के इतिहास का साक्षी रहा है। चाहे वह संगम तट के समीप बना इलाहाबाद किला हो या रामबाग स्थित Khusro Bagh उनके अस्तित्व पर मुहर लगाता है। आज इस लेख में हम प्रयागराज में स्थित खुसरोबाग के बारें में जानेंगे। 

ख़ुसरो बाग(khusro bagh) कहाँ स्थित है और इसका ऐतिहासिक महत्व क्या है?

वैसे तो यह खुसरो, उसकी माँ और बहन के मकबरे के लिए प्रसिद्ध है। लेकिन जहांगीर ने इसे आरामगाह के रूप में बनवाया था। यह 17 बीघा क्षेत्रफल में फैला हुआ हुआ है जो की चारों ओर से लंबी और मोटी दीवारों से घेरी गई हैं। इसके चारों तरफ दरवाजे हैं वहीं प्रवेश द्वार बहुत ही विशाल है। 

यह प्रयागराज जंक्शन से 100 मीटर की दूरी पर स्थित है। इसका निर्माण अकबर के पुत्र जहांगीर ने 1599-1605 ई. के मध्य करवाया था। ऐसा कहा जाता है की खुसरो को अकबर अपने उत्तराधिकारी के रूप में देखता था। लेकिन अंत में उसने जहांगीर(वास्तविक नाम-सलीम) उपाधि देकर उसे अपना राज्य सौंप दिया। आइये जानते हैं यहां स्थित मकबरों के बारें में –

कुल मिलाकर यहां चार मकबरे स्थित है जिसमें शाह बेगम का मकबरा, खुसरो मिर्जा का मकबरा, नीथार बेगम का मकबरा एवं बीबी तमोलन का मकबरा   

शाह बेगम का मकबरा 

शाह बेगम(मान बाई), जिनका नाम मंज़िल-उन-निसा बेगम था। ये राजस्थान के आमेर राज्य के राजा भगवनदास की बेटी और अकबर के नौरत्न दरबारी मिर्जा राजा मानसिंह की बहन थीं। उनका विवाह जहाँगीर से 1584 ई. में हुआ था। जिसके तीन साल बाद  ख़ुसरो मिर्जा का जन्म हुआ था। 

पुत्र ख़ुसरो और पति जहाँगीर के बीच हो रही राजनैतिक और व्यक्तिगत कलह से अत्यंत दुखी थी। जिससे 1604 ई. में शाह बेगम ने ज़हर खाकर अपनी जान दे दी। उनके इस कदम ने मुग़ल दरबार को एक सदमा पहुँचा दिया। इनका मकबरा 1607 ई. में बनवाया गया था। 

यह मकबरा के फतेहपुर सिकरी के मोडल जैसा बताते हैं। यह बहुत ही सादगीपूर्ण है ना कोई बारीक नक्काशी, ना ही ऊँचे गुम्बद है। यह एक त्रिस्तरीय इमारत है। 

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ख़ुसरो मिर्ज़ा का मकबरा

ख़ुसरो मिर्जा मुगल सम्राट जहाँगीर (सलिम) के ज्येष्ठ पुत्र थे। जहाँगीर के गद्दी पर बैठते ही उनके और ख़ुसरो के संबंधों के मध्य सत्ता को लेकर खींचतान होने लगी। सन् 1606 में ख़ुसरो ने अपने पिता के विरुद्ध विद्रोह कर दिया और पंजाब की ओर भागा लेकिन उन्हें पकड़ लिया गया।

जहाँगीर ने उसे पकड़कर आगरा में बंदी बना दिया। बाद में शाहजहाँ (ख़ुर्रम), जो उनका छोटा भाई था, ने ख़ुसरो की हत्या करवा दी। ऐसा माना जाता है कि 1622 ई. में ख़ुसरो की गला घोंट कर हत्या कर दी गई। बाद में उन्हें प्रयागराज लाकर यहीं दफ़नाया गया। इनके घोड़ी की कब्र भी इन्ही के पास में स्थित है। 

यह मकबरा उत्तरी भाग में स्थित है। यह लाल बलुआ पत्थर से निर्मित है। इसमें विशाल द्वार भी है जो मुगलकालीन स्थापत्य का खूबसूरत उदाहरण है।  

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खुसरो मिर्जा का मकबरा, खुसरो बाग प्रयागराज

निथार बेगम का मकबरा

नीथार बेगम खुसरो मिर्जा की बहन थी। उसने दोनों की मृत्यु के बाद इस बाग कों विकसित कराया था। तीनों मकबरों में सबसे खूबसुरत माना जाता है। लेकिन अंदर यह खाली है। निथार बेगम ने स्वयं अपने मकबरे की योजना बनवाई थी। और इसने निर्माण कार्य की देख-रेख भी स्वयं की।

मकबरे की दीवारों पर सुंदर फूल-पत्तियों की कारीगरी, मेहराबें, और छत की चित्रकारी आज भी विद्यमान है। यह मुगल कालीन शैली के अनुरुप चारबाग शैली में है। कुछ लोग इसे आगरा के मकबरे के समकक्ष मानते है। 

नीथर बेगम का मकबरा  खुसरो बाग प्रयागराज
नीथर बेगम का मकबरा
बीबी तमोलन का मकबरा

बीबी तमोलन का मकबरा

खुसरो बाग(Khusro Bagh) के दक्षिणी छोर पर स्थित यह मकबरा अन्य तीनों से छोटा है। कोई विशिष्ट शिलालेख उपलब्ध नहीं होने के कारण इतिहासकारों के लिए इसकी पहचान को और जटिल बना देता है। 

1857 ई. स्वतन्त्रता संग्राम में किया गया था Khusro Bagh प्रयोग 

खुसरोबाग का प्रयोग प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम में किया गया था। उस समय इलाहाबाद की अगुवाई लियाकत अली कर रहे थे। उस समय खुसरो बाग का प्रयोग भारतीय सैनिकों के लिए  किया गया था पर अंग्रेजों ने बहुत जल्दी ही इलाहाबाद को अपने नियन्त्रण में ले लिया था। 

निष्कर्ष –

Khusro Bagh एक ऐसा स्थान है जहाँ आत्मा की शांति और इतिहास की गूंज एक साथ मिलती है। यहाँ मकबरे ही नहीं, बल्कि मुगल इतिहास के अनकहे पन्नों की भी गवाही है। ये तीनों मकबरे सिर्फ पत्थर की संरचनाएँ नहीं हैं; वे संघर्षों, भावनाओं और त्याग की आवाज़ हैं जो मुगल वंश की राजनीति के पीछे दबी रहीं। यदि आप अगली बार प्रयागराज जाएँ तो इस बाग में कुछ देर रुकें; शायद आपको खुसरो की कुछ और जानकारी मिल जाएगी।ऐसी ही एक और ऐतिहासिक इमारत है जिसका नाम राम बगिया है –

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