भूमिका: जब एक विदेशी ने कहा – “यह भूमि सबसे पवित्र है”
7वीं शताब्दी में चीनी यात्री ह्वेन त्सांग ने प्रयागराज की यात्रा की। अपनी यात्रा के बाद वह तीर्थराज प्रयाग से इतना प्रभावित हुआ की उसने इसे ‘संपूर्ण पृथ्वी पर सबसे पवित्र तीर्थ’ स्थल कह दिया। जब एक विदेशी की लेखनी इसे पूरे दुनियां का सबसे पवित्र स्थान कह दे तो समझ लेना आवश्यक है की यह आध्यात्मिक रूप से कितना धनी रहा है। जबकि उसका कोई ना धर्म से और ना ही देश से कोई संबन्ध था। यह लेख ह्वेन त्सांग की प्रयागराज यात्रा के उसी ऐतिहासिक अनुभव से जुड़ा हुआ है, जिसे आज एक प्रमाण की तरह भी प्रयोग किया जाता है।
ह्वेन त्सांग: एक परिचय –
उनका का जन्म 602 ईस्वी, चीन में हुआ था। वो भारत की यात्रा पर 629–645 ईस्वी के मध्य आया। जिसका उद्देश्य बौद्ध ग्रंथों की खोज, बौद्ध शिक्षा का अध्ययन करना था। वह भारत में 17 सालों तक रहा और अपनी भारत यात्रा का पूरा विवरण सि-यू-की नामक ग्रंथ में किया है। उसने 100 से अधिक जगहों की यात्रा की।
ह्वेन त्सांग प्रयागराज यात्रा का संदर्भ –
वह मथुरा, कन्नौज, वाराणसी, गया, नालंदा जैसे प्रमुख स्थलों की यात्रा के साथ -साथ प्रयागराज की भी यात्रा की। उनके अनुसार “यह वह स्थान है जहाँ दो महान नदियाँ – गंगा और यमुना – मिलती हैं। यहाँ श्रद्धालु बड़ी संख्या में आते हैं, स्नान करते हैं और पुण्य प्राप्त करने की कामना करते हैं।”
संगम और तीर्थ-स्नान का महत्व
ह्वेन त्सांग प्रयागराज में अपनी यात्रा का वर्णन करते हुए संगम का जिक्र किया है। उसने बताया की तीन पवित्र नदियों का मिलन स्थल है परंतु तीसरी नदी अदृश्य है। साथ ही उसने आगे बताया की प्रयाग में माघ के महीने में हजारों लोग स्नान करने आते है। जिसमें खासतौर पर पूर्णिमा के दिन काफी ज्यादा भीड़ होती है। वह आगे लिखते हैं की वर्षों की कठिन तपस्या के बाद स्नान कर मोक्ष पाने की आशा करते हैं।
धार्मिक गतिविधियाँ जो उन्होंने देखीं:
संगम में लोग स्नान करने के उपरांत व्रत रखते है। साथ ही प्रयाग में अन्न, वस्त्र, स्वर्ण, गौ-दान बहुत ही आम था। उसने हर्षवर्धन के बारें में भी लिखा हुआ है। कई पंडालों में यज्ञ-हवन जैसे वैदिक अनुष्ठान होते थे। साथ ही यहां सभी पंथों को सम्मान दिया जाता था। वैदिक, शैव, बौद्ध, जैन आदि जैसे धर्म को मानने वाले लोग आया करते थे।
प्रयागराज में स्थित दिगम्बर जैन मंदिर के बारें में भी पढ़ें –
Si-Yu-Ki(सि-यू-की) में तीर्थराज प्रयाग का स्थान –
उनके ग्रंथ Si-Yu-Ki में प्रयागराज को बौद्ध पंथ के अतिरिक्त भी अत्यंत महत्व का स्थान बताया गया है:
- उन्होंने लिखा है की “यह स्थल बौद्ध परंपरा से सीधे नहीं जुड़ा था, फिर भी यहाँ की धार्मिक एकता और अध्यात्म की गहराई अविश्वसनीय है।”
- उन्होंने अपने ग्रंथ में लिखा है कि बुद्ध ने अपने पिछले जन्मों में इस क्षेत्र में तप किया था, जिससे प्रयाग का बौद्ध दृष्टि से भी सम्मान था।
ह्वेन त्सांग ने प्रयाग में एक पुराना बौद्ध स्तूप और मठों का का उल्लेख किया है ऐसा कहा जा सकता है की ये अशोक काल के समय के रहे होंगे। साथ ही उन्होंने यह भी माना है की हिंदू परंपरा यहाँ अधिक प्रभावी थी।
प्रयागराज का 7वीं शताब्दी में स्वरूप (ह्वेन त्सांग की प्रयागराज यात्रा के समय):
- उन्होंने अपने ग्रंथ में उल्लेख किया है की उस समय कोई बड़ा किला या महल नहीं था। लेकिन बहुत से आश्रम व कुटियाँ मौजूद थे।
- जबकि तीर्थयात्रियों के लिए अस्थायी बांस-निर्मित मंडप बनाए जाते थे।
- नदी के किनारे पर भिक्षुकों के लिए अन्नदान और पानी की व्यवस्था की जाती थी।
- अच्छाई और परोपकार की भावना इसकी जड़ों में शामिल था।
निष्कर्ष:
ह्वेन त्सांग की प्रयागराज यात्रा ना सिर्फ एक सांस्कृतिक ज्ञान था बल्कि वह विदेशी की श्रद्धा का प्रमाण बन गई।
प्रयागराज का सम्मान उनके यात्रा लेखन से पूरी दुनिया तक पहुँचा। आज यह ना सिर्फ गंगा-यमुना और सरस्वती नदी का संगम नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और सहिष्णुता का संगम भी है।
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