विज्ञान के क्षेत्र में प्रयागराज के वैज्ञानिक अजय कुमार सोनकर ने अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। वे मोती उगाने की क्रांतिकारी तकनीक में भारत सहित पूरी दुनिया में अपनी अलग जगह बना चुके हैं। उन्हें हाल ही में मास्को में आयोजित 38वें अंतर्राष्ट्रीय पुस्तक मेले में आमंत्रित किया गया है, जहां वे भारतीय प्रतिनिधिमंडल के साथ अपनी खोजों को प्रस्तुत करेंगे और विज्ञान जगत में भारत का नाम रोशन करेंगे।
वैज्ञानिक जीवन और उपलब्धियां
डॉ. सोनकर ने जापानी पर्ल कल्चर तकनीक देखकर मोती के प्रति दिलचस्पी ली। उन्होंने लगभग डेढ़ वर्ष के कठोर शोध के बाद टिश्यू कल्चर तकनीक से कृत्रिम मोती बनाने का तरीका खोज निकाला। यह सब उन्होंने बिना इंटरनेट और महंगी तकनीक के इस्तेमाल से किया। आज वे वैज्ञानिक हैं जो 68 से अधिक देशों में अपनी खोजों पर भाषण दे चुके हैं। उनके कई वैज्ञानिक जर्नल्स में उनके लेख प्रकाशित हुए हैं। इन्हे 2022 में भारत सरकार द्वारा पद्मश्री भी मिल चुका है।
मास्को अंतर्राष्ट्रीय पुस्तक मेले में आमंत्रण
डॉ. अजय सोनकर को हाल ही में मास्को में आयोजित 38वें अंतर्राष्ट्रीय पुस्तक मेले में आमंत्रित किया गया है, जहां वे कई वैज्ञानिक वार्ताओं में हिस्सा लेकर भारत का गौरव बढ़ाएंगे। यह उनके वैज्ञानिक योगदान की सराहना करते हुए उनकी शोध यात्रा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव है।
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गंगा नदी पर अनुसंधान
डॉ. सोनकर ने महाकुंभ के दौरान गंगा नदी के जल पर भी काम किया है, जिसमें उन्होंने बताया कि कैसे गंगा स्वयं को स्वच्छ रखती है। मार्च 2025 में एक्वाक्लचर यूरोप जर्नल(EAS) में उनका अध्ययन प्रकाशित हुआ। जिसमें उन्होंने पाया कि गंगा में 1,100 प्रकार के बैक्टीरियोफेज होते हैं जो घातक घातक हानिकारक बैक्टीरिया को खत्म करते हैं।
क्यों है प्रयागराज के वैज्ञानिक अजय सोनकर का काम खास?
डॉ. अजय सोनकर ने अंडमान से दूरी के बावजूद सीप के टिश्यू कल्चर को जीवित रखकर प्रयोगशाला में मोती बनाया, जो न केवल शोध के क्षेत्र में अनूठा है, बल्कि भारतीय विज्ञान को विश्व मानचित्र पर स्थापित करने वाला भी है।
डॉ. अजय सोनकर की कहानी से पता चलता है कि भारत में भी वैज्ञानिक उपलब्धियां दुनिया के सर्वश्रेष्ठ स्तर पर पहुंच सकती हैं, बस समर्पण, परिश्रम और नवाचार हो। न केवल प्रयागराज बल्कि पूरे देश उनके इस अनुकरणीय कार्य से गर्व करता है।
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