प्रयागराज, भारत-जापान की सांस्कृतिक विरासत का अनूठा संगम बनने वाला है। यमुना के किनारे अरैल में महाकुंभ 2025 के बाद बनने वाला नया पब्लिक प्लाजा पार्क दोनों देशों की संस्कृतियों का जीवंत प्रतीक होगा, जो स्थानीय पर्यटन और सांस्कृतिक कार्यक्रमों को नई उंचाईयों पर ले जाएगा।
पब्लिक प्लाजा पार्क प्रयागराज परियोजना की जानकारी
यमुना नदी के किनारे अरैल क्षेत्र में बनने जा रहे पब्लिक प्लाजा पार्क, प्रयागराज में भारत-जापान संस्कृति का एक अनूठा संगम प्रस्तुत करेगा। यह अभियान, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर महाकुंभ 2025 के बाद शुरू होगा, जो दोनों सभ्यताओं के स्थापत्य, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक समन्वय को दर्शाएगा। निर्माण और डिजाइन सेवा संस्थान (CNDS) द्वारा विकसित इस पार्क का क्षेत्रफल लगभग 3 हेक्टेयर होगा और इसकी लागत लगभग 124 करोड़ रुपये होगी।
भारत-जापान सांस्कृतिक संगम पार्क के मुख्य आकर्षण
पार्क का डिजाइन जापानी शिंतो और भारतीय सनातन संस्कृति के मिश्रण पर आधारित होगा, जिसमें पांच प्रमुख जोन होंगे। द्वार पर शिंतो संस्कृति का प्रतीक टोरी गेट बनाया जाएगा, जो भौतिक से आध्यात्मिक स्थान में प्रवेश दर्शाता है। पार्क में जेन पार्क जो की ध्यान और आत्म-चिंतन का अनुकूल वातावरण प्रदान करेगा। जपानी उद्यान और मियावाकी उद्यान जापानी प्रकृति संवर्धन तकनीक से बनाया गया है। इसके साथ योग जोन और भारतीय मंदिरों की वास्तुकला; जहाँ योगाभ्यास और भारत की सांस्कृतिक कला दिखाई देगी। यहां जापानी टी सेरेमनी और इकेबाना, भारतीय नृत्य संगीत सहित अन्य सांस्कृतिक गतिविधियां भी होंगे।
सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व
यह पार्क केवल मनोरंजन का स्थल नहीं होगा, बल्कि शांति, ध्यान, आत्म-चिंतन और आत्म-अनुशासन का केंद्र बनेगा। दोनों संस्कृतियों के साझा दर्शन, जैसे भारत का “वसुधैव कुटुम्बकम्” और जापान का “वा” दर्शन, समरसता, शांति और विश्व बंधुत्व को प्रोत्साहित करते हैं, जिन्हें यह पार्क मूर्त स्वरूप में प्रस्तुत करेगा।
सारांश
प्रयागराज में बनने वाला भारत-जापान संस्कृति संगम पार्क आध्यात्मिकता, संस्कृति और शांति का एक महत्वपूर्ण केंद्र होगा। यह शहर की सांस्कृतिक धरोहर को समृद्ध करेगा और जापान और भारत के बीच एक सांस्कृतिक पुल बनेगा। यह परियोजना पर्यटकों के साथ-साथ सांस्कृतिक और आध्यात्मिक अध्ययन का भी केंद्र बनेगी।
दिल्ली लाल किले के पास हुए विस्फोट में जांच प्रयागराज तक पहुंची।

