भैया इह प्रयागराज तीर्थ नगरी और इहाँ हर साल लागत है कुम्भ के मेला। सही समझे दोस्त जहां लोग भीड़ में खोए से बचे के खातिर नए-नए तरकीब खोज लेत है। जैसे इस साल के कुम्भ मेला में गुरु एक जना के परिवार पूरी डोरी के अंदर-अंदर ही चल रहा था। वैसे इतना सतर्क होने के बाद भी कुम्भ मेला की भीड़ में खोना एक कला समझो।
खोया पाया केंद्र पर होती है बिछड़ों से मिलने की लंबी-लंबी कतारें –
अभी फिलहाल जब महाकुंभ का आयोजन हो रहा था। तो मैंने एक घोषणा सुनी, “वेनेला रेड्डी यहां खोया-पाया क्षेत्र में आपका इंतजार कर रही हैं। अब मेरे दिमाग में एक प्रश्न आया की अगर उनको हिन्दी ना आती हो तो। और रही बात अंग्रेजी को तो मै काफी देर तक खड़ा था। पर एक भी बार सुनाई नहीं दिया। अब अगर वो ध्यान से उस नाम को सुन पाए तो जरूर संपर्क किए होंगे।
आलम ये था की कुछ तो लोग नहा रहे और उसके बाद उनका अपने लोगों से साथ छूट गया और वो अब बिना कपड़ों के ही खोया-पाया केंद्र पर घोषणा करा रहे हैं थे की जहां भी हो इस जगह पर आ जाओ।
कुछ का खोना तो जानबूझकर कुछ जातें है रास्ता भटक –
कुछ तो बेचारे खो जाते हैं पर कुछ तो जानबूझकर साथ छोड़ देते होंगे अरे भाई आखिर उनको घूम-घूम के आनंद जो लेना है। कहीं बाबा जी पंडाल में जाना होगा तो कहीं का भंडारा खाने या कोई और रोमांचकारी चीज। इस साल तो गजब ही था खोया-पाया वाले घर वालों को माइक दे देते थे की आप ही बुलाओ। फिर क्या, “अरे बाबा कन्हा गए हम इहि बरगद के पेड़ के पास है, जल्दी आव बेटा घर चले मे देर होई जात बा।
बाबाजी को खोने पर लोग खोज रहे और बाबाजी भगवान भजन में मगन –
कुछ बुजुर्ग तो इस भीड़ ऐसे खोए की फिर उनके घर वाले पोस्टर ही चिपका रहे। नाम- रामप्रसाद, रंग- गेहुआं, धोती-कुर्ता पहने हुए उनके सिर दायें हाथ पर चोट के निशान जिन्हे भी मिले कृपया इस नंबर पर संपर्क करें। बाद में पता चलता ही की बाबा जी तो सत्संग बैठ के सुन रहे थे। और इधर घर वालें के आँखों से आँशु निकलना शुरू हो गए। और बाबाजी हा हा हा हम सोच थोड़ा भगवान के भजन कई लेवल जाए। तभी तो कह रहे कुम्भ मेला की भीड़ में खोना एक कला है।
जलेबी लेने गए पापा भूल गए की बेटे कहां छोड़े थे –
वैसे पुलिस वाले भी पूरी तत्परता के साथ नाम – सन्नी बता रहा है और पापा मोटे से है कंधे पर लाल रंग की रुमाल लिए है और गुटखा खाते हैं। कहे थे की जलेबी लेने जा रहे अब तक अइबे नहीं किए। यहां लोग खोने से बचने के लिए खास तरीके भी अपनाते हैं पर फिर भी कुछ लोग रही जाते है। जो अपनों से बिछड़ जाते हैं। अब ये कुम्भ मेला की भीड़ में खोना एक कला है ही।
वैसे यहां खोने वाला व्यक्ति कभी बाबा बन जाते है तो कभी कवि। तीर्थ के इतने बड़े संगम में खो जाना भी किसी-किसी के लिए स्वर्णिम यात्रा बन जाती है। और सभी को एक अच्छे कहानीकार की तरह बताते फिरते है की क्या-क्या हुआ। जब भी आइए अपना और अपनों का ख्याल रखिए क्योंकि कभी-कभी चीजें भारी पड़ जाती हैं।

