प्रयागराज के शांत इलाके शंकरगढ़ में बसा एक पुराना मंदिर अचानक सुर्खियों में आ गया है। सदर बाजार स्थित यह राम जानकी मंदिर, जो करीब 200 साल पुराना है, वहां हो रहे निर्माण को लेकर एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया। क्या यह अवैध निर्माण है या मालिक की मर्जी? इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में इस मामले में बड़ा फैसला सुनाया है, जो निजी संपत्ति के अधिकारों को लेकर एक मिसाल कायम कर सकता है।
शंकरगढ़ राम जानकी मंदिर PIL क्यों खारिज हुई?
6 दिसंबर 2025 को घनश्याम प्रसाद केसरवानी की जनहित याचिका (PIL) को इलाहाबाद हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने सिरे से खारिज कर दिया। याचिकाकर्ता ने दावा किया कि शंकरगढ़ के राम जानकी मंदिर परिसर में व्यावसायिक उद्देश्य से अवैध निर्माण हो रहा है और राज्य सरकार से कार्रवाई की मांग की थी। लेकिन कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि निजी या गैर-सरकारी संपत्ति के मामलों में PIL दाखिल करना उचित नहीं है।
मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र की बेंच ने फैसला दिया कि नगर पंचायत शंकरगढ़ के राजस्व रिकॉर्ड के अनुसार मंदिर की पूरी जमीन राजा महेंद्र प्रताप सिंह की निजी संपत्ति है। याचिकाकर्ता ने यह साबित नहीं किया कि यह सरकारी जमीन है। याचिकाकर्ता को न्यायालय ने कानूनी प्रक्रिया के तहत सिविल कोर्ट या उचित फोरम में जाने की अनुमति दी है। इस निर्णय से स्पष्ट है कि धार्मिक स्थानों पर निजी मालिकाना हक भी सम्मानित होना चाहिए।
याचिका में उत्तर प्रदेश के धार्मिक कार्य विभाग के प्रधान सचिव, प्रयागराज के कमिश्नर, डीएम, बारा तहसील के एसडीएम, शंकरगढ़ नगर पंचायत के ईओ और राजा महेंद्र प्रताप सिंह को पक्षकार बनाया गया। राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने खुद स्वीकार किया कि श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए चार फीट की सड़क को दस फीट चौड़ा किया जा रहा है, और उनकी अनुमति से सभी कार्य चल रहे हैं।
निजी हक और आस्था का संतुलन
कुल मिलाकर, इलाहाबाद हाईकोर्ट का निर्णय निजी संपत्ति के अधिकारों को बढ़ाता है, लेकिन धार्मिक स्थानों की सुरक्षा पर सवाल उठता है। यदि कानूनी प्रक्रिया का पालन किया जाता है, तो राम जानकी मंदिर अब शांतिपूर्वक अपना निर्माण कार्य पूरा कर सकेगा।
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