परिचय
क्या आप जानते हैं कि प्रयागराज का दधिकांदो मेला मात्र एक धार्मिक उत्सव ना होकर बल्कि अंग्रेजों के खिलाफ भारत की स्वतंत्रता के लिए एक गुप्त रणनीति का हिस्सा था? 150 वर्ष पुराना यह मेला आज भी भक्ति, संस्कृति और सामाजिक एकता का प्रतीक है। हम इस मेले के इतिहास, वर्तमान और 2025 के उत्सव के बारे में जानेंगें।
दधिकांदो मेला का ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व
1890 में, अंग्रेजी सरकार ने इलाहाबाद के कैंट क्षेत्र में किसी भी उत्सव या सभा को रोक दिया करती थी। इसी के फलस्वरूप दधिकांदो मेले की शुरूआत हुई। उस समय के स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारियों ने राष्ट्रवादी विचारों और धार्मिक उत्सवों के बहाने लोगों को एकत्र करने की योजना बनाई। दधिकांदो मेला इसी योजना का एक भाग था।
यह मेला ब्रह्मचारी बाबा और अन्य क्रांतिकारियों द्वारा स्थापित किया गया। तीर्थ पुरोहित रामकैलाश पाठक, विजय चंद्र और सुमित्रा देवी जैसे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और स्थानीय नेता ने मेला की योजना बनाई और इसे विरोध और एकजुटता का माध्यम बनाया। जिसका लक्ष्य था धार्मिक नाम से एकत्र होकर स्वतंत्रता आंदोलन को बढ़ावा देना। 1922 एवं 1927 में अंग्रेजों ने इस मेले पर प्रतिबंध लगाने की कोशिश की, लेकिन जनता के विरोध की वजह से मेला चलता रहा।
दधिकांदो का अर्थ
“दधिकांदो” शब्द का अर्थ है दही फोड़ना। भगवान श्रीकृष्ण और बलराम की लीला के अनुसार, दही और मक्खन के साथ उनके खेलों को दर्शाने वाला यह मेला उनकी पूजा का प्रतीक बन गया।
2025 में दधिकांदो मेले का आयोजन और विशेषताएं
इसकी शुरुआत 23 अगस्त शनिवार यानि आज से शुरू हुआ है। 23 अगस्त 2025 को सलोरी से मेले का आगाज हुआ है। इसके बाद 24 अगस्त को सुलेमसराय, 25 अगस्त तेलियरगंज, 31 अगस्त राजापुर, तथा 5-6 सितंबर को कीडगंज में आयोजन होगा।
इस वर्ष मेले में सुरक्षा और डिजिटल सजावट पर विशेष जोर दिया गया है। श्रीकृष्ण-बलदाऊ की भव्य शोभा यात्रा, शिव मंदिर में विशेष पूजा और झांकियां सबसे बड़े आकर्षण हैं। मेले की रौनक स्थानीय नृत्य, भजन-कीर्तन और पारंपरिक खेलों से बढ़ता है।

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प्रयागराज का दधिकांदो मेला: सांस्कृतिक समरसता का प्रतीक
यह मेला सामाजिक एकता और धार्मिक विश्वासों का उत्सव है। विभिन्न वर्ग, जाति और धर्मों से आने वाले लोग इस मेले को एकता का पावन समारोह मानते हैं। स्थानीय हस्तशिल्प और भोजन भी मेले के मुख्य आकर्षण हैं, जो क्षेत्रीय संस्कृति को दिखाते हैं।
दधिकांदो मेला: थोड़ा और जानें
पहले इस मेले में मशाल और लालटेन की रौशनी होती थी, अब यह विद्युत लाइट्स से सजाया जाता है। श्रीकृष्ण-बलदाऊ की सवारी मेले में पहले पैदल निकाली जाती थी, लेकिन अब हाथी पर निकाली जाती है। 1922 में, अंग्रेजी राज में यह मेला रोका गया, लेकिन स्थानीय लोगों ने इसे पुनः मनाना शुरू किया।
निष्कर्ष
दधिकांदो मेला प्रयागराज ऐसा सांस्कृतिक-सांप्रदायिक समारोह है जो इतिहास की कठिनाईओं और धार्मिक उत्साह को एकजुट करता है। यह मेला न केवल भगवान श्रीकृष्ण के प्रति श्रद्धा व्यक्त करता है, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम के संघर्षशील लक्ष्यों का भी प्रतीक है। 2025 का मेला आधुनिकता, इतिहास और प्राचीनता को एकत्र करता है। अगर आप प्रयागराज में हैं, तो इसे इन्जॉय करना चाहिए।
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