इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक गंभीर और संवेदनशील मामले में महत्वपूर्ण निर्णय दिया है। उसने सरकारी कर्मचारी (लेखपाल) पर लगे 16 वर्षीय बेटी के साथ यौन उत्पीड़न के आरोप से जुड़ी ट्रायल कोर्ट की सजा और उम्रकैद पर रोक लगा दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल आरोप ही किसी व्यक्ति के रोज़ी-रोटी कमाने के अधिकार को प्रभावित नहीं करना चाहिए।
इलाहाबाद हाईकोर्ट बेटी रेप केस की पूरी जानकारी
जनवरी 2026 को, जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस प्रशांत कुमार श्रीवास्तव की डिवीजन बेंच ने यह निर्णय सुनाया। आरोपी एक लेखपाल (सरकारी कर्मचारी) हैं, जिन्हें अपनी 16 साल की बेटी के साथ यौन शोषण का दोषी पाया गया।
20 मई 2024 को, ट्रायल कोर्ट ने POCSO अधिनियम की धारा 6 (बाल यौन शोषण), IPC की धारा 313 (झूठी गवाही), 323 (चोट पहुंचाना), 504 (अपमान) और 506 (धमकी) के तहत उम्रकैद की सजा सुनाई। यही सजा आरोपी के दोस्त विमल कुमार और तलाक के मामले में वकील सोनू तिवारी को भी मिली।
तीनों ने अपील दायर की। कोर्ट ने दोषसिद्धि निलंबित कर जमानत दे दी। आरोपी के खिलाफ मामला लंबित अपील में है, और नजदीकी समय में उसका निपटारा होने की संभावना नहीं है। ऐसे में आरोपी को जेल भेजकर उसे अपनी आय स्रोत से वंचित करना उचित नहीं है।
आरोप और बचाव
यह 12 जनवरी 2020 का मामला है। शिकायतकर्ता (आरोपी की तलाकशुदा पत्नी) ने शिकायत दर्ज कराई। शिकायत के अनुसार, पति ने 10 साल की उम्र से तीसरी कक्षा से बेटी का शोषण किया था। यह भी दावा किया गया कि बेटी को स्कूल से ले जाकर होटलों में आपत्तिजनक स्थानों पर ले जाया गया। जिसमें बेटी को गर्भवती होने तक का दावा किया गया और जबरन गर्भपात का आरोप भी शामिल है।
आरोपी की मां (पीड़िता की दादी) और दूसरी पत्नी भी शामिल हैं। विरोध करने पर पिटाई और धमकी दी गई। बचाव पक्ष: वकील पक्ष ने कहा कि उसकी अलग रह रही पत्नी ने यह एक बुरी साजिश की थी। आरोपी ने 4 जनवरी 2020 को तलाक याचिका दाखिल की, जिसके 8 दिन बाद जवाबी प्रक्रिया में शिकायतकर्ता की तरफ से एफआईआर दर्ज की गई। जिसमें बलात्कार के आरोप भी शामिल थे। नाराज होकर बेटी ने मां के बहकावे में झूठ बोला। मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार कोई चोट नहीं पाई गई, साथ हि बयान भी विरोधाभासी है।
कोर्ट का तर्क
कोर्ट नें स्पष्ट रूप से कहा, “किसी व्यक्ति के आजीविका के अधिकार को कम नहीं किया जा सकता। उसे रोजी-रोटी कमाने का भी अधिकार है। सिर्फ एक मामले में फंसने से जीवन खत्म नहीं हो सकता। सरकारी वकील ने विरोध प्रकट किया, लेकिन बचाव की दलीलों को खारिज नहीं कर सका। कोर्ट ने अपील तक सजा स्थगित कर दी।
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