प्रयागराज: लगभग 24 वर्ष जेल में रहने के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक व्यक्ति को रिहा करने का ऐतिहासिक निर्णय दिया है। हाईकोर्ट ने पाया कि निचली अदालत ने त्रुटिपूर्वक जांच और सबूतों का मूल्यांकन किया था, जिससे एक व्यक्ति को जीवन भर की सजा दी गई थी। इस फैसले ने न केवल उस व्यक्ति को न्याय दिलाया है बल्कि न्यायिक प्रक्रिया में संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के महत्व को भी उजागर किया है।
24 साल बाद जेल से बरी, क्या था सच?
यह मामला 2000 के दशक की शुरुआत का है जब मैनपुरी में एक डकैती का आरोप लगाया गया था। 2002 में अभियुक्त आज़ाद खान को जीवन-कैद की सजा सुनाई गई थी। उसका बयान, CrPC की धारा 313 के तहत दर्ज किया गया, उस समय की ट्रायल कोर्ट के निर्णय का मुख्य आधार था।
लेकिन निचली अदालत ने यह नहीं देखा कि बयान वास्तविक सबूतों के अभाव में लिया गया है या दबाव/डर के प्रभाव में दिया गया है। कोर्ट ने इसे पर्याप्त माना और उसके आधार पर सजा सुनाई।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
इलाहाबाद हाईकोर्ट के दो बेंचीय जज न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति संजीव कुमार ने पिछली सुनवाई में कई महत्वपूर्ण मुद्दों का उल्लेख किया:
- साक्ष्य का महत्व: जब तक कोर्ट के सामने कोई अन्य साक्ष्य या गवाह मौजूद नहीं हैं, तो केवल धारा 313 के बयान पर दोषसिद्धि नहीं दी जा सकती।
- बयान की वैधता: रिकॉर्ड ने बताया कि अभियुक्त ने अपने बयान में बार-बार बताया कि वह जेल से बाहर आने पर जान के खतरे में है।
- कानूनी मदद की कमी: धारा 21 में दिए गए अधिकारों का उल्लंघन अभियुक्त को उचित कानूनी सहायता नहीं मिली।
- सबूत की कमी: अभियोजन पक्ष ने अपराध से सीधे संबंधित साक्ष्य या गवाह नहीं पेश किए। ऐसे में सजा केवल बयान पर निर्भर नहीं हो सकती।
इन सब बातों को देखते हुए, अदालत ने पाया कि ट्रायल कोर्ट का फैसला कानूनन त्रुटिपूर्ण था, इसलिए उसे दोषसिद्धि से बरी कर दिया। इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह निर्णय सिर्फ एक कैदी की रिहाई नहीं है वरन् यह निर्णय न्यायिक प्रक्रिया में सबूतों, कानूनी सहायता और संवैधानिक अधिकारों को मजबूत करता है।
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