भारतीय शास्त्रीय संगीत, संगीत शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में प्रयाग संगीत समिति लगभग एक शताब्दी से एक अग्रणी संस्था रही है। 1926 में महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर डॉ. रंजीत सिंह, बैजनाथ सहाय और सत्यनंद जोशी ने इसकी स्थापना की। यह भारतीय शास्त्रीय संगीत को संरक्षित करने, लोगों तक पहुँचाने और नई पीढ़ी को शिक्षित करने के लिए है।
प्रयाग संगीत समिति की स्थापना और इतिहास
प्रयाग संगीत समिति का मूल उद्देश्य भारत की विशाल संगीत परंपरा को बचाना और उसे देश-विदेश में पुनर्जीवित करना था। 1920 के दशक में कला और संस्कृति को बचाने के लिए कई संस्थाएं बनीं, लेकिन प्रयाग संगीत समिति ने अपने अद्वितीय काम और उत्कृष्टता के कारण एक अलग जगह बनाई। डॉ. रंजीत सिंह और उनके सहयोगियों ने भारतीय संगीत की सेवा में अपना जीवन समर्पित कर दिया। समय के साथ, समिति ने हल्की धुनों, ध्रुपद, खिलड़ी, खरिज़ी और अन्य शास्त्रीय संगीत रूपों का संरक्षण किया।

प्रमुख भवन और प्रयाग संगीत समिति का केंद्र
समिति का मुख्य परिसर प्रयागराज के दक्षिण मलाका(1936 में) और अल्फ्रेड पार्क (चंद्रशेखर आजाद पार्क, 1955 में ) में है। इस पार्क के परिसर में ‘मुक्तांगन’ नाम का बड़ा ओपन-एयर थिएटर भी है, जिसमें लगभग 2500 दर्शकों के बैठने की क्षमता है। यहां पर नियमित रूप से संगीत प्रतियोगिताएं, सांस्कृतिक कार्यक्रम, सेमिनार, और समारोह आयोजित होते रहते हैं। इसके अलावा परिसर मेंं, समिति के सदस्यों, संगीतकारों एवं शैक्षणिक कार्य के लिए भवन और प्रशिक्षण केंद्र भी हैं।
समिति के देश-विदेश में अनेक उपकेंद्र भी हैं, जैसे अमेरिका, सिंगापुर, मॉरीशस, स्पेन और इंडोनेशिया में, जहाँ भारतीय संगीत का प्रचार-प्रसार किया जाता है।
प्रयाग संगीत समिति शैक्षणिक कार्यक्रम
प्रयाग संगीत समिति में 1-2 वर्ष से लेकर 8 वर्ष तक के पाठ्यक्रम प्रदान किए जाते है।
जूनियर डिप्लोमा: प्रारंभिक संगीत सिद्धांत और प्रयोगात्मक ज्ञान दिए जाते हैं। इसकी अवधि (1–2) वर्ष है।
सीनियर डिप्लोमा: गहन तकनीकी और प्रदर्शन कौशल का विकास करवाया जाता है। इसका समयावधि (3–4) वर्ष है।
संगीत प्रभाकर: मध्यवर्ती स्तर का प्रमाणपत्र, जो संगीत की सैद्धांतिक और व्यावहारिक विशेषताओं को शामिल करता है। संगीत प्रभाकर का पाठ्यक्रम (5–6) वर्ष तक चलता है।
संगीत प्रवीण: उच्च स्तर का प्रमाणपत्र जो कलाकार को पेशेवर योग्यता प्रदान करता है।
संगीताचार्य: शोध और गहन अध्ययन के बाद प्रदान की जाने वाली उच्चतम उपाधि मिल जाती है। प्रविण संगीताचार्य का पाठ्यक्रम अवधि (7–8) वर्ष की है।
प्रशिक्षण में मुख्यतः
इसमें क्लासिकल और अर्ध-क्लासिकल गायन, वादन (जैसे तबला, सितार, बांसुरी, हारमोनियम, गिटार आदि) और नृत्य (जैसे कथक, भरतनाट्यम) शामिल हैं। शास्त्रीय सिद्धांत, संगीत का इतिहास, ताल, राग और प्रस्तुति कला पाठ्यक्रम में विशेष ध्यान दिया जाता हैं। समिति की पाठ्यक्रम संरचना सुनिश्चित करती है कि विद्यार्थी न सिर्फ तकनीकी ज्ञान प्राप्त करें बल्कि संगीत की मान्यताओं, विचारों और भावनात्मक अभिव्यक्ति को भी समझें।

सांस्कृतिक परियोजनाओं और योगदान
प्रयाग संगीत समिति अक्सर सांस्कृतिक कार्यशालाओं, सम्मेलनों, प्रदर्शनों और भव्य संगीत महोत्सवों का आयोजन करती है। इनसे संगीत प्रेमियों में जागरूकता बढ़ती है और नई प्रतिभाओं को मंच मिलता है। उत्तर प्रदेश में संगीत शिक्षा को औपचारिक मान्यता और सम्मान मिलने में समिति ने महत्वपूर्ण योगदान दिया।
डिजिटल युग में, समिति ने ऑनलाइन संगीत कक्षाएं और वेबिनार भी शुरू किए हैं, ताकि नई पीढ़ी को घर बैठे संगीत की शिक्षा मिल सके। इसके अलावा, संगीत को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर प्रसारित करने के लिए वीडियो, रिकॉर्डिंग, और आर्टिकल्स के माध्यम से संगीत की विरासत को विश्वव्यापी स्तर पर पहुंचाने का कार्य भी किया जा रहा है।
वैज्ञानिक एवं शोधगत पहल
समिति का अनुसंधान पर भी विशेष ध्यान रहता है। संगीत के विभिन्न हिस्सों जैसे राग निर्माण, ताल विज्ञान, और ध्वनि विज्ञान पर लगातार शोध किए जाते हैं। छात्रों को उनकी योग्यता के लिए शोधार्थियों को संगीताचार्य की उपाधि प्रदान की जाती है। ये अध्ययन भारतीय संगीत की परंपरा को आधुनिक परिप्रेक्ष्य में समझने में मदद करते हैं और इसे नए युग के साथ जोड़ने में मदद करते हैं।
Prayag Sangeet Samiti के प्रसिद्ध कलाकार और पूर्व छात्र
पंडित विष्णु दिगंबर पालुष्कार, पंडित भीमसेन जोशी, जगजीत सिंह, शौभा मुद्गल, मलिनी अवस्थी, शारदा सिन्हा, पं. राजन एवं साजन मिश्रा, पं. छन्नू लाल मिश्रा, पं. किशन महाराज ने समिति में अपनी कला प्रस्तुत की है।
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Prayag Sangeet Samiti का सामाजिक एवं शैक्षिक प्रभाव
उसने संगीत को सिर्फ कला नहीं बल्कि एक जीवन दर्शन, संस्कृति और सामाजिक एकता का रूप दिया है। बहुत से छात्रों ने संगीत को अपना पेशा बनाकर संगीत क्षेत्र को शिक्षकों, संगीतकारों और शोधकर्ताओं के रूप में समृद्ध किया है। साथ ही, समिति ने आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों के लिए छात्रवृत्तियाँ और सस्ती कक्षाएं प्रदान करने जैसे सामाजिक कार्यों में भी भाग लिया है। Prayaag Sangeet Samiti के प्रमाणपत्रों को BHU, CBSE जैसे संस्थानों ने स्नातक या परास्नातक स्तर के समान मानते हैं।
निष्कर्ष
प्रयाग संगीत समिति केवल एक शैक्षणिक संस्थान नहीं है; यह भारतीय शास्त्रीय संगीत का संरक्षण करती है, प्रचार करता है और एक विश्वव्यापी मंच बनाता है। पूर्व के गौरवों की विरासत को बचाने और नए युग की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए यह संस्था निरंतर नवाचार करती रहती है। यदि आप वोकल, वाद्य या नृत्य में रुचि रखते हैं, तो यह आपके लिए अच्छी मार्गदर्शक बन सकती है।
अल्फ्रेड पार्क में ही प्रयागराज पुस्तकालय और इलाहाबाद संग्रहालय भी हैं।

