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गुरूवार, दिसम्बर 4, 2025

विजय बहुगुणा: प्रयागराज से उत्तराखंड के मुख्यमंत्री तक का सफर

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गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के पावन संगम की धरती – प्रयागराज। यह शहर सिर्फ धार्मिक आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि विचार, विद्या और राजनीति का भी गढ़ रहा है। विजय बहुगुणा जिन्होंने उत्तराखंड की राजनीति और भारतीय न्यायपालिका दोनों में अपनी पहचान रखते हैं। यहां के विश्वविद्यालय की बौद्धिक बहसें, और अदालतों में गूंजती दलीलें कई पीढ़ियों से नेताओं, साहित्यकारों और न्यायविदों को गढ़ती आई हैं।

विजय बहुगुणा का प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

Vijay Bahuguna का जन्म 28 फरवरी 1947 को प्रयागराज (तब इलाहाबाद) में हुआ था। उनके पिता हेमवती नंदन बहुगुणा एक स्वतंत्रता सेनानी और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री थे, जबकि उनकी माता कमला बहुगुणा एक सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता थीं। बहन रीता बहुगुणा जोशी भी एक लोकप्रिय राजनीतिज्ञ हैं।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बी.ए. और एल.एल.बी. की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने वकालत में कदम रखा और धीरे-धीरे न्यायपालिका में अपनी पहचान बनाई।

न्यायपालिका से राजनीति में कदम

विजय बहुगुणा ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में वकील के रूप में अपने करियर की शुरुआत की, फिर न्यायाधीश बने। मुंबई हाईकोर्ट में भी न्यायाधीश रहे। उनका न्यायिक जीवन सफल रहा, लेकिन समाज के लिए सीधे काम करने की इच्छा ने उन्हें राजनीति में आने की प्रेरणा दी।

विजय बहुगुणा का राजनीतिक करियर की शुरुआत और संघर्ष

1997 में, उन्होंने टिहरी गढ़वाल लोकसभा सीट से कांग्रेस पार्टी से पहला चुनाव लड़ा, लेकिन हार गए। लोकसभा चुनाव में उन्हे लगातार चार बार हार का सामना करना पड़ा। आखिरकार  2007 के उपचुनाव में टिहरी गढ़वाल से चुनाव जीतकर संसद में शामिल हुए। 2012 में वह उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बने और 14वीं और 15वीं लोकसभा के सदस्य रहे।

मुख्यमंत्री कार्यकाल और 2013 की त्रासदी

इन्ही के मुख्यमंत्री के कार्यकाल में उत्तराखंड की 2013 की विनाशकारी बाढ़ आई थी। इस दौरान राहत और बचाव कार्यों का नेतृत्व किया गया था। उसकी सरकार को कई बार आलोचना भी हुई, लेकिन उन्होंने कठिन समय में भी काम किया और लोगों की मदद करने का प्रयास किया।

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विजय बहुगुणा उत्तराखंड मुख्यमंत्री

दल बदल और आगे की यात्रा

उन्होंने जनवरी 2014 में मुख्यमंत्री पद छोड़ दिया और 2016 में कांग्रेस छोड़कर भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल हो गए। 2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी से टिकट नहीं मिला लेकिन वे राजनीति में सक्रिय रहे। उनके बेटे सौरभ बहुगुणा ने भी भाजपा से ही विधायक बनें।

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विजय बहगुणा जी के व्यक्तिगत जीवन और परिवार

विजय बहगुणा की पत्नी का नाम सुधा बहगुणा है। इनके परिवार पर राजनीति का गहरा असर है। पिता बहन के अलावा अब बेटे भी राजनीति में सक्रिय रहे हैं। उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के राज्यों में इनके परिवार का महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है। 

विवाद और आलोचना

राजनीति में विवाद और आलोचना होना बहुत बड़ी बात नहीं होती है। इनके भी राजनीतिक जीवन में कई निर्णय विवाद में रहें जिसमे आपदा प्रबंधन प्रमुख रहा। इसके बाद जब काँग्रेस को छोड़कर भाजपा मेंं शामिल हुए जिसमें उन्हे आलोचना झेलनी पड़ी। फिर भी उन्होंने अपने निर्णयों का बचाव बड़ी ईमानदारी से किया। 

निष्कर्ष

विजय बहुगुणा ने न्यायाधीश से मुख्यमंत्री तक के असंभव सफर का रास्ता आसान कर दिखाया। उनका जीवन भी परंपरा, संघर्ष और बदलाव का संगम था। वह संघर्ष करते हैं, नेतृत्व और सेवा करते रहे, जिससे हर व्यक्ति यह सीख सकता है कि अवसरों और चुनौतीओं में दृढ़ रहना जरूरी है।

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