प्रयागराज, दिल्ली और कैम्ब्रिज तक पहुँचे, लेकिन जहाँ भी रहे, अपनी कविता और भाषा से लोगों को जोड़ते रहे। हिंदी साहित्य में हरिवंश राय बच्चन की कविताएँ दिल को छूती थीं। उनकी काव्यशैली में जीवन के विभिन्न पहलुओं की अभिव्यक्ति, सरलता और गहराई स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। अब भी, उनकी प्रसिद्ध कृति “मधुशाला” हिंदी कविता का एक अनमोल रत्न है।
हरिवंश राय बच्चन का जन्म और परिवार
हरिवंश राय बच्चन का जन्म (27 नवंबर 1907 – 18 जनवरी 2003) प्रयागराज में हुआ था। इनका मूल नाम हरिवंश राय श्रीवास्तव था। उनका परिवार प्रतापगढ़ जिले से था, लेकिन वे प्रयागराज में जन्मे और बड़े हुए। उन्होंने अपनी शिक्षा और साहित्यिक यात्रा की शुरुआत प्रयागराज से की।
इनका पहला विवाह श्यामा देवी से हुआ जिनका दुर्भाग्यवश असमय मृत्यु हो गई। जिसने उन्हे गहरा आघात पहुंचाया। इनका दूसरी पत्नी का नाम तेजी बच्चन था, जिनसे इनके पुत्र अमिताभ बच्चन और अजिताभ बच्चन हुए।

हरिवंश राय बच्चन की शिक्षा
इन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में मास्टर की डिग्री प्राप्त की। बाद में वें इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में अध्यापन कार्य भी किया। बाद में वे कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय(इंग्लैंड) गए जहां वे W.B. Yeats की कविताओं शोध किए एवं पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उनकी विदेशी शिक्षा ने उनकी दृष्टि को व्यापक बनाया और भारतीय और पश्चिमी साहित्य का गहन अध्ययन किया।
साहित्यिक यात्रा की शुरुआत
इनकी साहित्यिक रचनाओं का दौर(1930 मेंं) छायावाद युग में शुरू हुआ। इनकी कविता में लोकभाषा और दार्शनिक विचारों का अद्भुत मेल हुआ। उनकी सबसे प्रसिद्ध कृति “मधुशाला”(1935) ने उन्हें अमर कर दिया। इसके अलावा मधुबाला, मधुकलश, निशा निमंत्रण, सोपान, दशद्वार से सोलह खिड़कियाँ और तेरा हार आदि रचनाएं रही हैं।
वे आत्मकथात्मक लेखक भी हैं उन्होंने आत्मकथा के चार चार खंड लिखे – ‘क्या भूलूँ क्या याद करूँ’ नीड़ का निर्माण फिर, बसेरे से दूर और दशद्वार से सोपान तक में अपने विचारों और अनुभवों को बताते हैं। इनके अलावा, वे शेक्सपियर, ओमर खय्याम और यीट्स की रचनाओं का हिंदी में अनुवाद किया।
मधुशाला का महत्व
‘मधुशाला’ में शराब, जाम, साकी, प्यास जैसे शब्दों के जरिए जीवन के विविध रंगों को दर्शाया। “मधुशाला” शराब की के गुणगान का गीत मात्र नहीं, बल्कि जीवन, मृत्यु, प्रेम और आध्यात्म पर एक दार्शनिक कविता है। इस कविता से इन्हे इतनी प्रसिद्धि मिली की लोग इनके काव्य-पाठ का घंटों इंतजार करते थे। कुछ लोगों ने इनकी आलोचना भी की क्योंकि शराब के प्रतीकों को कई लोग गलत अर्थ में लेने लगे। यह कविता आज भी काफी लोकप्रिय है।
प्रयागराज से साहित्यिक जुड़ाव
प्रयागराज के साहित्यिक वातावरण का इनके व्यक्तित्व व लेखन में गहरा प्रभाव डाला। यहां के साहित्यिक सभा और विश्वविद्यालय के मंचों ने इन्हे मजबूत साहित्यिक आधार दिया। यहां की संस्कृति से कविता लेखन में नई दिशा देने में मदद की।
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दिल्ली चरण: विदेश मंत्रालय, राजभाषा और एक नया शब्द
कैम्ब्रिज से लौटकर उन्होंने आकाशवाणी में कार्य किया। उसके उपरांत 1955 में भारत सरकार के विदेश मंत्रालय में स्पेशल ऑफिसर ऑन ड्यूटी के रूप मेंं नियुक्त हुए। जहाँ वे हिंदी को राजकीय और कूटनीतिक संचार में स्थापित करने के प्रयासों से जुड़े। कई जगहों पर ‘विदेश मंत्रालय’ शब्द के गढ़ने का श्रेय भी दिया जाता है।
हरिवंश राय बच्चन जी के पुरस्कार और सम्मान
इन्हे ‘दो चट्टानें’ कृति के लिए 196 में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। 1976 में इन्हे पद्म भूषण पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इन्हे राज्यसभा का सदस्य(1966-1972 तक) बनने का गौरव प्राप्त हुआ। इसके अलावा इन्होंने हिन्दी कविता को वैश्विक मंच तक पहुँचाया। 2000 ई. में इनके नाम का 5 रुपये का डाक टिकट भी जारी किया गया।

निधन एवं विरासत
18 जनवरी 2003 कों लंबी बीमारी के बाद मुंबई में इनका इनका निधन हो गया। लेकिन उनकी कविताओं और लेखों को हिन्दी साहित्य में पढ़ाएं जाते हैं। उनकी काव्य-यात्रा हिन्दी कविता में मील का पत्थर है। उनके शब्दों की मिठास और गहराई आज भी साहित्य प्रेमियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई है। हरिवंश राय बच्चन ने हिंदी कविता को समृद्ध करते हुए जीवन के विभिन्न पक्षों के बारें में लिखी, जो आज भी लोगों को छूती है।
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