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मंगलवार, फ़रवरी 10, 2026

गढ़वा किला शंकरगढ़ प्रयागराज: इतिहास, मूर्तियां और पुरातात्विक रहस्य

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प्रयागराज ऐसी धरती जो ना सिर्फ संगम और धार्मिक मेलों के साथ ही यह प्राचीन इतिहास और पुरातात्विक धरोहरों के लिए भी प्रसिद्ध है। इन्हीं में से एक है गढ़वा किला (Garhwa Fort) शंकरगढ़ प्रयागराज जिले में स्थित है। यह स्थान गुप्तकालीन कला और मंदिर वास्तुकला का एक अद्भुत संग्रह है।

गढ़वा किले का इतिहास और निर्माण

बारा के गुप्त काल से 1300 साल बाद बघेल राजा विक्रमादित्य ने लगभग 1750 में गढ़वा किला बनवाया था। यह किला लगभग दो किलोमीटर के व्यास में फैला हुआ है। उस समय की स्थापत्य कला और सुरक्षा का एक अच्छा उदाहरण है। गुप्तकाल (4वीं–6वीं शताब्दी ईस्वी) के बीच में यहां शासन किया। उस समय ये क्षेत्र समृद्ध माना जाता है। लेकिन इसके बाद इस किले में बाहरी आक्रमणकारियों द्वारा मूर्तियाँ एवं संपदा लूट लिया गया। 

भारतीय पुरातत्व विभाग ने गुप्तकाल के भगवान बुद्ध, हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियां और संस्कृत में लिखे अभिलेखों को इस किले के आस-पास खोजा है। इस समय के राजाओं जैसे चंद्रगुप्त, कुमारगुप्त, एवं स्कंदगुप्त के सात अभिलेख भी यहां से प्राप्त हुए हैं। शेष अवशेषों से पता चलता है कि यह स्थान एक समृद्ध नगर था, जिसे “भट्ट ग्राम” कहा जाता था। जो अब बरगढ़ नाम से जाना जाता है। 

 गढ़वा किला (Garhwa Fort) शंकरगढ़  प्रयागराज में मूर्तियों के अवशेष

किले के अंदर क्या है?

मंदिर और गर्भगृह

गढ़वा किले के पश्चिमी भाग में पत्थर का मंदिर है, जिसमें गर्भगृह और मंडप हैं। मंदिर में शिवलिंग की स्थापना हुई थी परंतु अब शिवलिंग मौजूद नहीं है। लेकीन मंदिर की दीवारों पर महिलाओं की नक्काशी, भगवान गणेश की आकृतियाँ और पुष्पमाला के डिजाइन आज भी हैं। मंडप के आंशिक रूप से बिखरे हुए स्तंभों से पता चलता है कि स्थान धार्मिक और सांस्कृतिक क्रियाकलापों के लिए इस्तेमाल किया जाता था।

जलाशय और परकोटा(ऊंची दीवार)

किले के दक्षिणी-पश्चिमी भाग मंदिर स्थित है जिसमें चौकोर गर्भगृह है। इसके पूर्व में  दो बड़े जलाशय हैं जिनकी लंबाई 55 एवं चौड़ाई 30 मीटर है। जो शायद पूजा एवं दैनिक उपयोग के लिए बनाए गए थे। यह जलाशय काई जमने से हरा दिखता है। जलाशयों तक पहुंचने वाली आकर्षक सीढ़ियां और कटाव पत्थरों से बने हैं जो स्थापत्य कला की सूक्ष्मता को दर्शाते हैं।

मंदिर और जलाशय को जंगली जानवरों और संभावित शत्रुओं से बचाने के लिए चारों ओर पांच दीवारों  का परकोटा(चहारदीवारी) बनाया गया था।

मूर्तियां और पुरातात्विक अवशेष

गढ़वा किले का सबसे खास बात प्राचीन मूर्तियों को पुरातत्व विभाग द्वारा संग्रहालय में सुरक्षित रखा गया है। इनमें भगवान हनुमान, विष्णु के दस अवतार, जिन्हें दशावतार कहा जाता है, और अनेक देवी-देवताओं की मूर्तियां हैं। कई मूर्तिकला अपूर्ण हैं या केवल उनके कुछ हिस्से बचे हुए हैं।

मूर्तियों की लंबाई और मुद्रा के बारे में कुछ खास जानकारी इस प्रकार है

  • भगवान विष्णु की 10 फीट की पद्मासन रूप में बैठे हुई मूर्ति मिली है। भगवान विष्णु के मिले दशावतार की जो प्रतिमाएं मिली है उनकी ऊंचाई 8 फीट है। 
  • यहां पर विशाल बौद्ध मूर्ति भी मिली है। 
  • गणेश जी की भी टूटी हुई मूर्ति मिली है। इसके अलावा अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियाँ भी मिली हैं। 
  • गुप्त काल की मूर्तियाँ गुलाबी बलुआ पत्थर से बनाई गई हैं और अलंकरण से भरपूर हैं, जो इस युग की कला की एक विशेषता है। जबकि मध्यकाल की मूर्तियाँ धूसर बलुआ पत्थर से बनाई गई है।
  • बहुत सी मूर्तियां बैठी या खड़ी मुद्रा में हैं, जिनके पत्थर पर कलापूर्ण और बारीक नक्काशी है।
  • ज्यादातर मूर्तिकला टूटी हुई हैं या आंशिक रूप से सुरक्षित हैं। जबकि मूर्तियों की लंबाई आमतौर पर 2 से 4 फीट है।
  • मूर्तियों के नीचे अंकित GF-25, GF-26 जैसे संकेत उनके संग्रहण और वर्गीकरण के लिए प्रयोग में आते हैं।
  • इस पंचकोणीय (पंचकोना) विन्यास में शिलालेखों में प्राचीन देवनागरी/गुप्त लिपि और शुरुआती अंक-चिह्न (जैसे ८, १०, ८०, ९०) का उपयोग किया गया है। जो भारत में लिपि और गणित के विकास में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।
गढ़वा किला शंकरगढ़ प्रयागराज में दशावतार की कुर्मा मूर्ति
गढ़वा किला शंकरगढ़ प्रयागराज में दशावतार मेंं मत्स्यावतार मूर्ति

सभागार (मंडप) के स्तंभ और नक्काशी

किले के परिसर में मंडप के स्तंभों और दीवारों पर फूलों की डिजाइनों और महिलाओं की आकृतियों की सुंदर नक्काशी देख सकते हैं।  स्तंभों की बनावट अधूरी है, लेकिन उनकी कलाकारी अभी भी स्पष्ट है। ऐसे मंडपों से पता चलता है कि यह जगह सामाजिक और धार्मिक कार्यक्रमों के लिए प्रयुक्त होती थी।

इसे भी देखें – शंकरग़ढ़ कोट जो ‘राजा के महल’ के नाम से जानी जाती है, किले के पास स्थित है। 

किले का माहौल और वर्तमान स्थिति

किले में प्रवेश करते समय एक शांति और अकेलेपन का अनुभव होता है। किले की दीवारें, भवन, और मूर्तियां आज टूट-फूट हुई हैं, लेकिन उनके अस्तित्व से इतिहास जीवंत होता है। इस किले के रहस्यों को आसपास के गांवों की कहानियां और स्थानीय घटनाएं और भी गहरा करती हैं।

बघेलखंड राजघराने के कसौटा घराने के हुकूम सिंह एवं इनके वंशज शंकर सिंह नें इस किले की देख-रेख की। जब हुकूम सिंह नें इसका जीर्णोद्धार कराया था उस समय यहां प्राप्त अवशेष 1500 साल पुराने माने गए। 

कैसे जाएं गढ़वा किला शंकरगढ़ तक?

प्रयागराज से शंकरगढ़ रेलवे स्टेशन के बाद स्थानीय टैक्सी या निजी कार से जा सकते हैं। रेलवे स्टेशन से यह शिवराज-प्रतापपुर मार्ग़ पर स्थित है। किले तक पहुंचने के लिए लगभग सात से आठ किलोमीटर की यात्रा करनी होती है। रोड के द्वारा आप शंकरगढ़ एनटीपीसी से 4-5 किमी दूर बेनीपुर चौराहे से उत्तर दिशा की ओर 4 किमी की दूरी पर स्थित है गढ़वा गाँव। इसी गाँव के नजदीक है ये गढ़वा किला। निजी वाहन या स्थानीय टैक्सी या बस से यहां पहुंचना सबसे सुविधाजनक रहता है। 

निष्कर्ष –

गढ़वा किला शंकरगढ़ प्रयागराज भारतीय प्राचीन संरचना, संस्कृति और इतिहास का जीवंत प्रमाण है। यहाँ की मूर्तियाँ गुप्तकालीन कला का उत्कृष्ट उदाहरण हैं। इसकी मजबूत प्राचीर स्थानीय राजाओं की धरोहर बचाने की कोशिशे बताती है।

गढ़वा किला एक घूमने योग्य स्थान है अगर आप इतिहास, पुरातत्व या धार्मिक धरोहरों में रुचि रखते हैं।जानिए ऐसे ही ऐतिहासिक एवं पौराणिक स्थान भारद्वाज आश्रम प्रयागराज के बारें में।

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